Monday, October 18, 2010

चिंता क्यों करते हो

baहुत दिनों से कुछ लिखना ब्लॉग्गिंग करना बंद रहा सिलसिला शुरू हो सके इसलिए मेरे परम आदरणीय मुकुट बिहारी सरोज की एक रचना आपके लिए प्रस्तुत है

चिंता क्यों करते हो गलत बयानी प़र बूढ़ी दुनिया की
न्यायाधीश समय निर्णय कर देगा अपनेआप एक दिन

व्यर्थ नहीं जाता है बोया हुआ पसीना
अलबत्ता उगने में देर भले हो जाये
एक न एक रोज़ सुनवाई होगी श्रम की
मौजूदा युग में अंधेर भले हो जाये
अगर तुम्हारी फसल रही निर्दोष बादलों का विरोध क्या
सागर खुद क्यारी क्यारी भर देगा अपने आप एक दिन

बात अभी ऐसी है ये जितने वकील हैं
इन सबके मुहं बंद कर गयी है तरुणाई
ये पत्थरदिल कभी अश्रु का पक्छ न लेंगे
बे कसूर मर जाये भले कोंई तरुणाई
गिरफ्तार हो गए तुम्हारे नाबालिग sapne इससे क्या
सूरज खुद उड़ने लायक पर देगा apne aap ek din

इसमें कोंई शक नहीं कि हर रिश्वती बाग में
मौसम की मान मणी खुले आम चलती है
लेकिन इसका यह मतलब हरगिज़ मत लेना
दुर्दिन की अंधियारी रैन नहीं ढलती है
निर्वासित कर दिया तुम्हारा फूल क्यों कि काफी हँसता था
जंगल में मधुमास स्वयं घर देगा अपने आप एक दिन

1 comment:

  1. Bade dinon baad aapne wapasee kee hai...tahe dil se swagat hai!
    Rachana to bahut sundar hai,lekin aapke lekhan ka intezaar rahega!

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