सर्जना
Monday, September 7, 2026
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बुदेलखंड का दर्द ठीक बयां किया है आपने । भगत जी लेकिन ऐसा क्यूँ हुआ ?
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शमा जी , आपको पढना एक अद्भुत अनुभव होता है । अपने स्न्स्म्र्ण कहते हुए
Sunday, September 6, 2026
[17/04, 16:40] mahamna: चांद का रहता चित्त अधीर उभरती है रातों में पीर दृगबिंदु में दुख का सागर धरूं मैं कैसे धीर उभरती है रातों में पीरदेख नदी की विकल निबलता बादल जल भर लाए तटबंधों के अतिक्रम तोड़े किंतु लक्ष्य न पाए बहुत गंद तो बहा ले गई फिर भी रही विफल जिन नदियों को मां कहते हैं उघड़े उनके चीर देख रहा हूं लुटी मनुजता दानवदल का शोरश्रम सीकर के मानहरण निर्लज्जित हठ घनघोर ऊपर ऊपर यश गाथाएं 'तल में अपयश कीच केतु बांट रहे परसादी वंचित देवों से खीरअनय के आगे खड़े विनयवत छत्रप शूद्र सवर्ण दुर्योधन के रक्षक बनकर खड़े हुए हैं कर्ण मंत्रों की विकृत आवृतियां आएं कैसे देवकैसे जीते सत्य सनातन रण चूक रहे अब वीर[17/04, 16:40] mahamna: तुम हो हम हैं और हमारे साथ हमारी पीड़ाएं आओ सुख की करें प्रतीक्षा तब तक इनको ही गाएंअभी खौल है अपने भीतर पकने पर रस आएगा गर्मी वर्षा शिशिर सहेंगे तब बसंत मुस्काएगा साथ-साथ हैं यही बहुत है पल-पल को मधुमास बनाएं तुम हो हम हैं और हमारे साथ हमारी पीड़ाएं आओ सुख की करें प्रतीक्षा तब तक इनको ही गाएं चांद को देखो पूनम की हर मास प्रतीक्षा करता है पूरा खिलाने से पहले हर एक अमावस मरता है न रात रहे न ग्रहण रहे उत्सव प्रिय नित्य मनाएं तुम हो हम हैं और हमारे साथ हमारे पीड़ाएंआओ सुख की करें प्रतीक्षा तब तक इनको ही गाएं जिनसे सूरज भी हुआ पराजितउन कोनों का ध्यान करो पीर पराई पीने कोकुछ अपने हित बलिदान करोतुम स्नेह बनो, मैं बनूं वर्तिकातम से इनको मुक्ति दिलाएं
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17/04, 16:40] mahamna: चांद का रहता चित्त अधीर उभरती है रातों में पीर दृगबिंदु में दुख का सागर धरूं मैं कैसे धीर उभरती है रातों में पीरदेख न...
Monday, November 24, 2025
विपरीत दृष्टि को 'पतन' , , 'उत्थान' दिखता है शातिरों को बड़ा शातिर सदा भगवान दिखता है ऐब दिखते हैं औरो में अमल में फर्क रखते हैं आइने में नहीं इनको अपना शैतान दिखता है जलन में जल गए इतने जला डाला वतन अपनाअल्फलाह के लिए , , जलजला ईमान दिखता है खातिरेअल्फलाही के न जाने कामयाबी की इनकी है कौन पैमाईशजिंदगी जहन्नुम करके दीन परवान दिखता हैगर्द से भर गया ग़रदूं जमीं पर पट गई लाशेंवहशतों दहशतों में कौन सा सम्मान दिखता हैहरकते कायराना को शबाबे-दीन मत समझोनजरें खुदा ये कारनामा अहमकान दिखता है बेशर्मी की हद होती है इनके आगे वह भी रोती है ऐतबार तो कोई न करताबदकारी इनको ढोती है सिर्फ नफरते और नफरते मक्कारी से शब होती हैबाल सुअर का पड़ा दीद मेंइनको लगता वह मोती है जबजब मोदी का यश होताखुल जाती इनकी धोती हैमम
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विपरीत दृष्टि को 'पतन' , , 'उत्थान' दिखता है शातिरों को बड़ा शातिर सदा भगवान दिखता है ऐब दिखते हैं औरो में अमल में फ...
Friday, June 20, 2025
स्पान्टेनियस फ्लो के तीन गीत
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स्पॉन्टेनियस फ्लो के तीन गीत 1 गीत गाना धन कमाना बस यही तो काम है बेचते हैं वीर रस भी लक्ष्य केवल दाम है । बुझ चुके है प्रज्ञ-चक्षु संवेदना...
Wednesday, May 28, 2025
विनय न मानत जलधि जड़ ये लातो के मीतचाकर से मत आस कर भय बिन होय न प्रीत हम अनुगामी थे शौर्य के सिंहो के आदर्शभेड़ो के अनुगमन के हम कब हुए प्रदर्श करते रहो सवाल कि जब तक स्याही न जाए सूखमृगतृष्णा है आस कि जिनको धन मद पद की भूख
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विनय न मानत जलधि जड़ ये लातो के मीत चाकर से मत आस कर भय बिन होय न प्रीत हम अनुगामी थे शौर्य के सिंहो के आदर्श भेड़ो के अनुगमन के हम कब...
Saturday, May 24, 2025
छू दोगे गर लव से तुम ये कलाम गजल हो जाएगाकरो कुबूल मुहब्बत से ये सलाम गजल हो जाएगा हर इक सीने में इक दिल हर दिल में इक नाम रहेजिस नाम को दोगे अपना दिल वो नाम गजल हो जाएगामिलन के कई बहाने ग़रदूं ईद दीवाली होली हैआओगे जिस काम से मिलने वो काम गजल हो जाएगा
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छू दोगे गर लव से तुम ये कलाम गजल हो जाएगा करो कुबूल मुहब्बत से ये सलाम गजल हो जाएगा हर इक सीने में इक दिल हर दिल में इक नाम रहे जिसको दोगे ...
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