सर्जना
Monday, July 6, 2015
›
जिन भावों से अनुप्राणित हो छूट गया गृह, छोड़ा निजत्व अभिव्यक्ति में बहे वही अमृत सरिता , वह राष्ट्र तत्व जिसके सुख के लिए बिलखत...
कि मैं जिंदा हूं अभी
›
आतिशेदिल से जिगर खून खौलता है अभी आके सीने से लगा लो के मै जिन्दा हूं अभी इस तरह जीने से तो मौत कहीं बेहतर है गहरे खंजर को उतारो के मैं...
›
हम चाकर सरकार के जय विचार परिवार जबतक हाकिम आपके हम आप के मनसबदार आंखों मे देखकर पहचान लेते हैं दरकार कुत्ते के रोटी भेड़िए को बोट...
कृतसंकल्पित हूं मेरा हर कृत्य बने कविता
›
कृतसंकल्पित हूं मेरा हर कृत्य बने कविता गीत रामायण गीता कुरु नृत्य बने कविता राग विराग समर्पण सब जगती पर अर्पण शब्द साधना ऐसी चेते हर मन...
लघुकथा वक्तव्य
›
लघुकथा वक्तव्य जगदीश गुप्त भूख पर सेमिनार चल रहा था | पहले दिन बड़े गंभीर भाषण हुए | एक वक्ता ने सुझाव दिया कि हम किसी भूखे का वक्तव्...
कांच कंचन हुआ
›
आज नगर के सिद्ध और समर्थ गीतकारों के बीच यह गीत पढ़ने का संयोग बना | सौभाग्य से सबने सराहा| एक मांग भी आई कि इसमें वृद्धि की जाए | यह प्र...
Sunday, July 5, 2015
हो गया छवि देखकर मैं मुग्ध जिसकी
›
एक वर्षों पुराने खुदरा कागज से सहेज ली आज एक अनगढ़ रचना हो गया छवि देखकर मैं मुग्ध जिसकी आ रहा आभार है उस मूर्तिका पर मन मालिनी मकरंद ...
‹
›
Home
View web version