सर्जना

Friday, May 19, 2017

अल्पनाओं में कल्पनाओं में

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अल्पनाओं में कल्पनाओं के रंग लगे झरने  संदल स्वप्निल दृश्य दिवस निशि हृदय लगे भरने  सुख सरिता के स्रोत सुगम ,उन्मीलित माणिक दृग  रो...
Thursday, February 11, 2016

यूं संवासे तुम स्वयं को

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 एक नए बंध के साथ गीत पुनः प्रस्तुत कर रहा हूं यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ वेग में ...
1 comment:
Monday, July 6, 2015

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  जिन भावों से अनुप्राणित हो छूट गया गृह, छोड़ा निजत्व अभिव्यक्ति में बहे वही     अमृत सरिता ,     वह राष्ट्र तत्व जिसके सुख के लिए बिलखत...

कि मैं जिंदा हूं अभी

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आतिशेदिल से जिगर खून खौलता है अभी आके सीने से लगा लो के मै जिन्दा हूं अभी इस तरह जीने से तो मौत कहीं बेहतर है गहरे खंजर को उतारो के मैं...

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  हम चाकर सरकार के जय विचार परिवार जबतक हाकिम आपके हम आप के मनसबदार आंखों मे देखकर पहचान लेते हैं दरकार कुत्ते के रोटी भेड़िए को बोट...

कृतसंकल्पित हूं मेरा हर कृत्य बने कविता

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कृतसंकल्पित हूं मेरा हर कृत्य बने कविता गीत रामायण गीता कुरु नृत्य बने कविता राग विराग समर्पण सब जगती पर अर्पण शब्द साधना ऐसी चेते हर मन...

लघुकथा वक्तव्य

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लघुकथा वक्तव्य जगदीश गुप्त भूख पर सेमिनार चल रहा था | पहले दिन बड़े गंभीर भाषण हुए | एक वक्ता ने सुझाव दिया कि हम किसी भूखे का वक्तव्...
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