Tuesday, April 9, 2019

सरस नदी सी बहती हो मेरे मन में रहती हो मैं पत्थऱ घाट किनारे का तुम छ्ल छ्ल छूती रहती हो विहगों सी है ऊंची उड़ान कोकिल कंठी सुर मधुर तान विमल नवल तुम धवल कंवल मैं कंटक युति सांवल सेमल तुम शांत सरल मर्यादा में मुझे पल पल सहती रहती हो हिरण्यमयी द्युतिं कांति किरण मोहक मृदुला मधुहास अरूण तुम हो प्रभात की शुभ बेला में काम क्रोध मद मंद-पुंज मै हूं ज्वर का उत्ताप श्रृंग तुम दल -दल झरती रहती हो स्पर्शो की अनुभूति अंतरतम शीतल करती है तुम सुमन कली सी लज्जा में मैं बौराया सा भंवरा हूं संकोच मोच न हो पाया तुम कल कल करती रहती हो महामना जगुप्त अनुमानित सितम्वर1985-2019अप्रेल

सरस नदी सी बहती हो मेरे मन में रहती हो मैं पत्थऱ घाट किनारे का तुम छ्ल छ्ल छूती रहती हो विहगों सी है ऊंची उड़ान कोकिल कंठी सुर मधुर तान ...
Thursday, April 4, 2019

जो मिलना है खुदा से ,खुद से मिलने का तजुर्बा कर किसी मजबूर को महफूज करने का तजुर्वा कर मोहब्बत है तो खुलकर सामने आना जरूरी है किसी आशिक की आहों पे मरने का तजुर्वा कर मुलाकातो के जरिए है जरा सा हौसला तो कर हवा भर ले परो मे और उड़ने का तजुर्वा कर कि गुमसुम को तबस्सुम दे दवा बीमार को देकर खुशी पाने ,अना को जज़्ब करने का तजुर्वा कर न यूं गमगीन हो खुद भी न कर माहौल भी वैसा दिलोजां जीतने हैं तो, बिखरने का तजुर्वा कर ये ग़रदूं की गुजारिश है गुजारो शब हमारे संग महकना है तो संदल से लिपटने का तजुर्वा कर

जो मिलना है खुदा से ,खुद से मिलने का तजुर्बा कर किसी मजबूर को महफूज करने का तजुर्वा कर मोहब्बत है तो खुलकर सामने आना जरूरी है किसी आशिक क...