Tuesday, December 4, 2018

मेरी जान ले गया

मेरी जान ले गया है फिर भी है मुझसे रूठा
मुझे इंतजार उसका जिसने मुझे है लूटा

कह के मुझे अमावस ये भी कहा मिलूंगा
मेरे चांद का है वादा सच्चा कहूं कि झूठा

कैसे करूं बयां मैं उस सादगी का जलवा
लाखो में एक ग़रदूं वो नायाब नक्श बूटा

तस्कीन जिसको सुनना राहत है गुनगुनाना
उस निगार का है नगमा हर हाल में अनूठा

कोई इंतजारे जालिम कितना करेगा कब तक
चरागो के आते आते दम रोशनी का टूटा




Monday, December 3, 2018

चांद रूठे या किसी दिन

चांद रूठे या किसी दिन गम घटा बन छाएगा
जब कभी होगी ज़रूरत दिल जलाया जाएगा

ऐ खुदा मुझको बना दे तू चरागे - रहगुजर
यूं मेरा जलना किसी के काम तो आ जाएगा

आंसुओ को ढाल ले तू बादलो में गीत के
जा बरस मनमीत घर , कुछ राहते दे आएगा

मत दे हवाओं को हवा इस मौसमे खुदगर्ज में
क्या पता किस बात पे क्या हादसा हो जाएगा

आग ए नफ्रत भी जलाए और मुहब्बत भी सदा
सोच ले तू किस रजा के साथ में निभ पाएगा

तू जला दे शौक से गरदूं को घर का गम नहीं
पर ये वादा कर यहां से रौशनी ले जाएगा


जोड़ते ही दौड़ते ही हम रहे ये भूलकर
जाएगा आखिर में हर इक हाथ खाली जाएगा

मैं चारागे जीस्त  होकर कर सकूं रौशन तुम्हें
दौड़ता ही तू रहा और जोड़ता ही तू रहा (ये भूलकर)

हुई व्यवस्था गुब्बारा

हुई व्यवस्था गुब्बारा आदर्श हो गए आवारा
जिनको आए सुई चुभोना उनकी है बस पो बारा

हवाले की हवा निकल गई सेंटकिट्स भी गोल हुआ
सूटकेस का पता नहीं है लालू का चारा ढोल हुआ
जिन जिन को भीतर जाना था छाती पे चढ़ आए दोबारा

परदेशी के धन से यारो जश्न मनाते आजादी का
भूल चुके हम ईस्ट इंडिया पेड़ सींचते बरबादी का
अपनी ही कब्रों की खातिर बना रहें हैं हम गारा

हत्यारो का पता चला न आयोगों की उम्र बढ़ गई
आंखों के आंसू न सूखे देखेगें  अबला चिता चढ़ गई
केवल झूठे फूल चढ़ेगें जान रहा है चौबारा

शक्कर फिर से मीठी हो गई सबूत पेश हुए हकले
फोन की घंटी बजे टनाटन जूते फिर से चल निकले
हाथी लगती सीबीआई पकड़े चालू बताए आरा

बचकर साफ निकल जाओगे सच्चा है गर घोटाला
छोटे मोटे में अगर फंसें तो जेल हुई समझो लाला
नहीं कमाया क्या बांटोगे लोग कहेंगें . बेचारा ल्ड

व्यवस्थाओं को हुई आंव है अजब ग़जब के पेंच दांव हैं
संविधान रग रग घायल है सच्चाई बिन हांथ पांव है
घोटालों का दंगल देखो ये मारा और वो मारा

लगभग बीस साल पुरानी रचना है 

सब चलता है

सब चलता है सब चलता है
राजनीति के दावानल में
सब जलता है सब जलता है

चुनाव तक है चर्चा सारी
दुश्मन सी जूतम पैजारी
फिर तो है मौसेरे भाई
एक ही मकसद  सिर्फ कमाई
उढा रहे वादों के मखमल
बातें दावे हवा हवाई
ये नेता नगरी क्या न करा दे
दया धर्म ईमान जला दे
अयोग्य को सम्मान दिला दे
काबिल का अपमान करा दे
इज़्जत अज़्मत शोहरत उल्फत
इसकी ऩज़रों में बस ईंधन
और ईधन तो बस जलता है

ये चाहें हड़ताल करा दें
ये चाहे तो रेल जला दें
मासूमो पर तेल छिड़क कर
जब चाहें तीली दिखला दें
जाति धर्म तो खूब जलाते
भाषा और प्रांत सुलगाते
श्मशानों तक चलने की भी
ज़हमत इनको नहीं गवारा
घर बेठे ही तंदूरो में नयना जल गई
सब जलता है
सब चलता है

अजब नीति यह रीति अजब है
सोए प्रहरी  चोर सजग है
पानी में यह आग लगा दे
कावेरी से कलुष करा दे
कर्नाटक से तमिल लड़ा दे
फिट करते रहना है गोटी
समझो इसकी खाल है मोटी
इसकी सिकती है तब रोटी
जब लोगो का घर जलता है

राजनीति कोयले की कोठी
इसमें गुपचुप गुनाह पलते
धोटालो के ठंडे बस्ते
अपराधों की अमर कथाएं
इसमे गुपचुप गुपचुप जलते
हो दीवाला या घोटाला
कभी पुरलिया कभी हवाला
हैरत में हैं हम भी वो भी
कैसे खुला रह गया ताला
पर देखो कैसे एक हुए थे
जब इनका दामन जलता है
सब चलता है



Monday, November 26, 2018

अपने अपने हुदय जगाओ

अपने अपने हृदय जगाओ ' शौर्य जगाओ जागो अब
समय देश का आया है ' मत दायित्वों से भागो अब

निष्ठाओं पर ग्रहण लगाने ' अनगिन राहू केतू हैं
अंधकूप वाचाल हो रहे, सबके अपने हेतु हैं
अनय कूट की मूर्च्छा हर ' अमिय बांटने निकलो अब 
निर्बल दीन हीन जीवन का तिमिर छांटने निकलो अब

नीति न्याय का समय उठे तम को यह स्वीकार नहीं
लोभ निगल लेता मूल्यों को ,सत्य को अब सत्कार नहीं
कटु दुर्नीति दमन करो, संस्कृति जगाने निकलो अब
बन रामकृष्ण 'बन महावीर' देवत्व जगाने निकलो अब

धनपशुओं को नहीं सुहाते ' सेवा, नवल प्रबंधन ' हाँ
कुलटा कूटों को ही भाते ' आंधियारे गठ्वंधन हां
शुद्ध बनो, नवबुद्ध बनो ,नववोध दिलाने निकलो अब
जनमन के दारिद्रय हरण' श्री बुद्धि खिलाने निकलो अब

Friday, May 19, 2017

अल्पनाओं में कल्पनाओं में

अल्पनाओं में कल्पनाओं के रंग लगे झरने 
संदल स्वप्निल दृश्य दिवस निशि हृदय लगे भरने 

सुख सरिता के स्रोत सुगम ,उन्मीलित माणिक दृग 
रोम रोम आह्लाद मुदित ,कंचन कस्तूरी मृग 
नवल धवल स्नेहमयी काया पुलकित पुलकित 
रिक्त व्योम में आकुल आतुर मेघ लगे घिरने 

नन्दित वन मयूर सम क्रम पर उन्मादित पथ संच 
सहज विराजित स्वयंश्री का गर्वित शोभित मंच 
तरुणाई पर अरुणाई का लाश्य लाश्य नर्तन 
अभिलाषित चातक अभिनंदित ,रूप सुधा वरने 

सहज दर्पिता रूप गर्विता कीलय वाक विलास 
मद्द मधु ऋतु ,सौम्य संहिता ,सत्कारी शुभ  हास 
सुभ्र दन्तिका चित्र पदमिनी ,धीर धरा गंभीर 
उद्धेलित कर्षण ,आकांक्षित ,विंध्य भर धरने 

चंद्रमुखी के अधर मध्य में पल्ल्व पंकज देश 
कौतुक कटि हठ ,धनिक कम्बु घट,विन्यासित पट केश 
उन्नत हिमगिरि ,मध्य शिवा सा अद्भुत अभाकाश 
चकित काम , संधान त्याग तज , जुटा  भक्ति करने 

जगदीश महामना "गर्दू ग़ाफ़िल "

Thursday, February 11, 2016

यूं संवासे तुम स्वयं को

 एक नए बंध के साथ गीत पुनः प्रस्तुत कर रहा हूं


यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ

वेग में आवेग में ,आवेश के परिवेश में
धीर ना छूटे कभी निज देश में परदेश में
हम रिषि संतान है,  व्यवहार में दीखे
सत्य के सन्मार्ग का अभ्यास बन जाओ
ऐसे डूबो ग्यान में,कि व्यास बन जाओ

यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ

त्याग का उत्सर्ग का ,उत्कर्ष का उन्वान
सत्य का सहभाग का सहयोग का सन्मान
धर्म की धारा धरा पर नित प्रवाहित कर
इस जगत की मौज के मधुमास बन जाओ
ऐसे डूबो भक्ति मेें , अरदास बन जाओ

यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ

मन सुमन खिल जाएं पुलके पौर घर आंगन
रूप से अनुराग का अनुबंध हो जीवन
लोकपथ से राजपथ के सेतु हेतु तुम
संत्रास से अवकाश ले उल्लास बन जाओ
ऐसे डूबो नृत्य में सुखरास बन जाओ

यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ




मम

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