Thursday, March 26, 2020

मैंने तो बस गोली एक ही दागी थी
तुम मरही गए मेरी मासूमियत पर

मैं खेल ही तो रहा था पेट्रोल बमों से
तुम्हें अब भी शक है मेरी नीयत पर

पत्थर उड़ कर आए थे मेरे हाथों में 
क्या बरसाता और तुम्हारे स्वागत पर

तेरा सर फूटा या किसी की आंख गई
मैं तो कायम था       मेरी इबादत पर

तुम मेरी तरह कभी हो ही नहीं सकते
ज्यादा से ज्यादा आओगे, तोहमत पर

तुम समझते हो कि मैं समझता नहीं
हंसू या रोऊं तुम्हारी जाहिलियत पर

एक है उलझन काफिर बनाए किसने
झल्लाऊं खुदा पर या शैतानियत पर

शैतान, बनाया किसने और किसलिए
हैरान परेशान हूं उसकी हैवानियत पर

जालिम को अपना कह जो माफ करे
जो भी हो वह धब्बा है इंसानियत पर

ग़रदूं
जुबां खानदान का पूरा पता देती है 
सीरतोअक्ल और इल्म बता देती है

घुस आए हैं उन्ही को डर लगता है 
चोर की दाढ़ी  बूटे का पता देती है

घिर के आई  ये कारी बदरिया कैसी
हवा की मौज मौसम का पता देती है 

बयां पे हंसते रहे उनके कोतो काजी 
आंख की चाल शरारत का पता देती है 

गंरदू को नहीं मालूम तुम्हारी तबियत
जर्द सूरत ही बीमारी का पता देती है 

ग़रदू गाफिल
घरवाली और घरवाले में  दंगा हो गया 
बीवी निकली दबंग आदमी नंगा हो गया
 
गुस्ताखी बस इतनी सी पतिदेव ने कर दी
 मांगा था नेकलेस हाथ में लाकर चैन ही धर दी
चैन भी क्या थी दुबली पतली दो तोले की माशा 
इसी बात पर सुबह शाम का हो गया खूब तमाशा
ऐसा मिला निखट्टू इससे कौन लगाऊं आशा
हाय हाय बादाम बताकर पकड़ा दिया बताशा
होली हुई दिवाली में और दिवाली....होली
पूरा सीजन निकला , वैलेंटाईन कतई न बोली
जी भर कोसा गाली भी दी और बहाई गंगा
धू-धू करके शंमा जली और साथ में जला पतंगा
फिर चैन वैन सब उजड़ा पंगा हो गया
एक दिन किसी के घर में यूं दंगा हो गया

बड़े चैन से कटते थे दोनों के दिन रात
घूमते फिरते रहते थे लिए हाथ में हाथ
हम हैं लैला मजनू ..कभी ना छूटे अपना साथ
खाया करते थे यूं कसमें बात बात बेबात
कल्लू कालू पर करती  थी गोरी जब बरसात
देख देखकर जलती थी रंडवो की बारात
देख एक विज्ञापन हीरा सदा के लिए है
बोलगया फिर बड़ा -"निछावर" अदा के लिए है
दौड़ा भागा पति बहुत पर हुआ ना कोई जुगाड़
यूं चांदी का चमचा  आखिर हो के रहा कबाड़
रांझा बन गई बिल्ला हीर भी रंगा हो गया
एक रोज किसी के घर में यूं दंगा हो गया

ऐसा उनमें मेल मिसाले देते थे सब लोग
पीस पीस कर दांत मसलते थे हाथों को लोग
लेते थे चटकारे भर भर के मस्साले लोग
हुआ नहीं वह भी कहते थे दिल के काले लोग
लगी निगोड़ी हाय बद्दुआ जब उसे मिला वेटेज
करते हैं जो प्यार घणी से घर लाते हैं प्रेस्टेज
प्रेस्टीज का प्रश्न बन गया कुकर ने मारी सिट्टी
होना था फिर वही हुआ पति को लग गई पट्टी
आखिरकार  मोहब्बत उन ने इस तरह से खर्ची 
इस ने ले ली हाथ में मिट्टी उसने ले ली मिर्ची
बचे न सर पर बाल  बेचारा "कंघा" हो गया.
एक रोज  किसी के घर में यूं दंगा हो गया

Monday, March 23, 2020

मन में पीड़ाएं बहुत हैं क्या कहें और क्या सुनेंछ्ल रहे हैं हम हमें ही क्या गुनें और क्या चुनें ?

मन में पीड़ाएं बहुत हैं क्या कहें और क्या सुनें
छ्ल रहे हैं हम हमें ही क्या गुनें और क्या चुनें ?

छांह तो मिलती है लेकिन राह खो जाती यहां
सम्वेदना भी वेदना के साथ सो जाती यहां
श्रमशील उद्यमिता जुटी है ताम्रपत्रों के लिए
और विलखता है इधर जीवन चरित्रों के लिए
आश्रमों में भगदड़े है होड़ वैभव के लिए
और तिरस्कृत त्याग तकता राह आश्रय के लिए
मन बसा है मूल्य में और तन रमा सुविधाओं में
श्रेष्ठंता निकृष्टता में भेद करना है कठिन
साधनों ओर साधना में आज हम किसकी सुनें

प्रश्नवाचक हो गए हैं मित्र भी और शत्रु भी
खो गए हैं धैर्य सारे धर्म के सब सूत्र भी
कुछ ढूढ़ना सभव नहीं जब दृष्टि ही अन्यत्र है
नवकुसुम की गंध में मदअंध करता इत्र हैं
गुरूपीठ पर है विकृ दर्पण लोभ मय है साधना
रस कहां से पाए जीवन समरस नहीं जब भावना
मुख फंसा है व्यंजनों में सुख है सरल अभिधाओं में
अनुशासितो भयशासितो में भेद करना है कठिन
अनुभूति या विभूतियों में हम कहो क्रिसकी सुने

गीत तो उगते हैं लेकिन लय तनिक सधती नहीं
बांसुरी खुलती है तो मृदुअंग बजती ही नहीं
भोग से भागा मगर जोग सध पाया नहीं
रात आधी हो चली  मन लौट कर आया नहीं
कैसे काटेंगे फसल जब बीज ही बोया नहीं
व्यासत्व  संभव ही नहीं निजता को यदि खोया नहीं
किसकी मानें प्रेम की या राज की दुविधाओं में
क्या सुखद है क्या दुखद है भेद करना है कठिन
चाहना और चेतना में अब हम कहो किसकी सुनें

महामना२४/३/१९  २:२२ अपरान्ह

Tuesday, December 31, 2019

शौक ये उम्रsभर लगाए रहिएमिजाज इश्किया बनाए रहिए बड़ा

शौक ये उम्रsभर लगाए रहिए
मिजाज इश्किया बनाए रहिए 

बड़ा एहसान आपका होगा
हमको सीने से लगाए रहिए

बड़ी बारीक है नज़र उनकी
उनसे कुछ फासले बनाए रहिए

हर कदम फूल खिलेंगे , तय  है 
अपनी ये शोखियां बचाए रहिए

रफ्ता रफ्ता मुकाम तय होंगे
दिल में  बस मंजिले बसाए २हिए

Sunday, August 25, 2019

कारवां ए-तूफां गुजारा कहां है

बड़े दिनों के बाद अफातु भाषा की एक रचना

कारवा ए तूफां गुजारा कहां है
अभी संग ढ़ग से उछाला कहां है

उड़ जाएगें तमाम हमामों के पर्दे
अभी जोश ने जोश पाला कहां है

अभी अपने अहलेअहद में हैं बैठे
औ कोई परचम निकाला कहां है

गुलूकार हम भी    हैं    माहिरे फन
हमें  मौसिकी  ने संभाला कहां   है

ऐ  ग़रदूं  गज़ल  तेरी  है  ये अधूरी
अभी  इश्क   इसमें  डाला कहां है

जब से तुमने राम कहा

जब से तुमने राम कहा , राम हुआ जाता हूं
प्रस्तर था सम्मुख तेरे प्रतिमान हुआ जाता हूं

उजला उजला कह कर, सारी कालिख धो दी
कीचड़ कीचड़ अंगनांई में तुलसी तुलसी बो दी
आलोकित मंदिर कर डाला ज्योतित कर दी कुटिया
जर्जर जीवन अभिलाषा को दे दी एक लकुटिया
दूषित कलुषित अपयश था यशगान हुआ जाता हूं
कामुक था सम्मुख तेरे निष्काम हुआ जाता हूं

जब से तुमने राम कहा , राम हुआ जाता हूं
प्रस्तर था सम्मुख तेरे प्रतिमान हुआ जाता हूं

प्रियवर प्रियवर कह कर मेरे कांटे सभी निकाले
क्रोध घृणा मत्सर नकार के शांत किए सब छाले
नेह प्रीत अभिसिंचित कर द्वेष और क्लेष बहाया
हीन पतित जग जीवन में उत्स और मोद जगाया
गरलताल था ,अमृतसर रसखान हुआ जाता हूं
अरिसुर था सम्मुख तेरे लय धाम हुआ जाता हूं

जब से तुमने राम कहा , राम हुआ जाता हूं
प्रस्तर था सम्मुख तेरे प्रतिमान हुआ जाता हूं

"महामना" जगदीश गुप्त

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