Thursday, February 11, 2016

 एक नए बंध के साथ गीत पुनः प्रस्तुत कर रहा हूं


यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ

वेग में आवेग में ,आवेश के परिवेश में
धीर ना छूटे कभी निज देश में परदेश में
हम रिषि संतान है,  व्यवहार में दीखे
सत्य के सन्मार्ग का अभ्यास बन जाओ
ऐसे डूबो ग्यान में,कि व्यास बन जाओ

यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ

त्याग का उत्सर्ग का ,उत्कर्ष का उन्वान
सत्य का सहभाग का सहयोग का सन्मान
धर्म की धारा धरा पर नित प्रवाहित कर
इस जगत की मौज के मधुमास बन जाओ
ऐसे डूबो भक्ति मेें , अरदास बन जाओ

यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ

मन सुमन खिल जाएं पुलके पौर घर आंगन
रूप से अनुराग का अनुबंध हो जीवन
लोकपथ से राजपथ के सेतु हेतु तुम
संत्रास से अवकाश ले उल्लास बन जाओ
ऐसे डूबो नृत्य में सुखरास बन जाओ

यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ




मम

Monday, July 6, 2015

  यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ

वेग में आवेग में ,आवेश के परिवेश में
धीर ना छूटे कभी निज देश में परदेश में
हम रिषि संतान है,  व्यवहार में दीखे
सत्य के सन्मार्ग का अभ्यास बन जाओ
ऐसे डूबो ग्यान में,कि व्यास बन जाओ

यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ

त्याग का उत्सर्ग का ,उत्कर्ष का उन्वान
सत्य का सहभाग का सहयोग का सन्मान
धर्म की धारा धरा पर नित प्रवाहित कर
इस जगत की मौज के मधुमास बन जाओ
ऐसे डूबो भक्ति मेें , अरदास बन जाओ

यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ

मम

  जिन भावों से अनुप्राणित हो छूट गया गृह, छोड़ा निजत्व
अभिव्यक्ति में बहे वही     अमृत सरिता ,     वह राष्ट्र तत्व
जिसके सुख के लिए बिलखता ,छोड़ आए निज माता को
शब्द श्वांस में  कृत्य कृति में गाओ उस भारत माता को




आतिशेदिल से जिगर खून खौलता है अभी
आके सीने से लगा लो के मै जिन्दा हूं अभी

इस तरह जीने से तो मौत कहीं बेहतर है
गहरे खंजर को उतारो के मैं जिन्दा हूं अभी

ऐसी तन्हाई से तो रुस़वाई में ही बेहतर थे
मेरे ज़ख्मों को सम्हालो के मैं जिन्दा हूं अभी

आग पानी में लगा  दो ये हुनर है तुम में
आग से आग बुझा दो के मै जिंदा हूं अभी

हिल गई रूहेजमीं तेरे सितम से जालिम
अब तो उल्फत के हवा दो के मैं जिन्दा हूं अभी
[8:37AM, 30/04/2015] jgdis Gupt:
मम
[9:10AM, 30/04/2015] Varaseoni Prnv: जगदीश जी
क्षमा कीजिये
आपकी रचना पढ़ा नहीं था
इस कारण मनोविकार आए ।
पढ़कर लगा कि आप भी
साहित्य के नरेंद्र मोदी जी हैं ।
आपकी सोच ऊँची है ।
आभार ,अभिनंदन ,वन्दन
प्रणय श्रीवास्तव अश्क
[12:01AM, 01/05/2015] jgdis Gupt: आतिशेदिल से जिगर खून खौलता है अभी
आके सीने से लगा लो के मै जिन्दा हूं अभी

इस तरह जीने से तो मौत कहीं बेहतर है
गहरे खंजर को उतारो के मैं जिन्दा हूं अभी

ऐसी तन्हाई से तो रुस़वाई में ही बेहतर थे
मेरे ज़ख्मों को सम्हालो के मैं जिन्दा हूं अभी

आग पानी में लगा  दो ये हुनर है तुम में
आग से आग बुझा दो के मै जिंदा हूं अभी

हिल गई रूहेजमीं तेरे सितम से जालिम
अब तो उल्फत के हवा दो के मैं जिन्दा हूं अभी

मम
[12:20AM, 01/05/2015] jgdis Gupt: पुराना तखल्लुस था ग़र्दूं
अब मानद उपाधि मिली है महामना

आपके स्नेह के लिए ह्रदय के घर के द्वार सदा खुले हैं
[12:24AM, 01/05/2015] jgdis Gupt: आतिशेदिल ने मेरा खून सुखाया है अभी
आके सीने से लगा लो के मैं जिन्दा हूं अभी

इस तरह जीने से तो मौत कहीं बेहतर है
गहरे खंजर को उतारो के मैं जिन्दा हूं अभी

ऐसी तन्हाई से रुस़वाई भली है "ग़र्दूं"
मेरे ज़ख्मों को सम्हालो के मैं जिन्दा हूं अभी

आग पानी में लगा  दो ये हुनर है तुम में
आग से आग बुझा दो के मै जिंदा हूं अभी

हिल गई रूहेजमीं तेरे सितम से जालिम
अब तो उल्फत को हवा दो के मैं जिन्दा हूं अभी



  हम चाकर सरकार के
जय विचार परिवार
जबतक हाकिम आपके
हम आप के मनसबदार

आंखों मे देखकर
पहचान लेते हैं दरकार
कुत्ते के रोटी भेड़िए को बोटी
जान छुड़ाते है सरकार


 उत्तरगामी सूर्य सदैव पश्चिम को ही जाता
घोर निशा के बाद पुनः पूर्व छितिज पर आता
हर बेला यूं तो परिवर्तन की बेला है
कितुं निशा में निशाचरों का त्रासद ही झेला है
आतंकित मन को तब अतीत याद आता है
घोर रात्रि में ब्रह्म बेला का गीत ही मन गाता है
वह अतीत का गीत भविष्य का स्वप्न बना है
वर्तमान का संबल  भविष्य का स्वर्णिम सत्य बना है



  हूं मेरा हर कृत्य बने कविता
गीत रामायण गीता कुरु नृत्य बने कविता

राग विराग समर्पण सब जगती पर अर्पण
शब्द साधना ऐसी चेते हर मन का दर्पण
 पूनम घोर अमावस सुबह दोपहरी संध्या
मंत्र चरैवेति का नित सिद्ध बने कविता

  कृतसंकल्पित हूं मेरा हर कृत्य बने कविता
गीत रामायण गीता कुरु नृत्य बने कविता


लघुकथा

वक्तव्य

जगदीश गुप्त

भूख पर सेमिनार चल रहा था | पहले दिन बड़े गंभीर भाषण हुए | एक वक्ता ने सुझाव दिया कि हम किसी भूखे का वक्तव्य भी सुनें | मुझे दायित्व मिला कि मैं किसी भूखे के ढ़ूढ कर लाऊं |
एक  होटल के आगे एक व्यक्ति मिला | जो भूखा लग रहा था लेकिन किसी से कुछ मांग भी नहीं रहा था| मैने स्वयं बढ़ कर उससे पूछा तो उसने बताया कि वह तीन दिन से निराहार है | मैे उसे भोजन कराने का आश्वासन देकर साथ ले आया | अभी भोजन में  समय था | वक्तव्य चल रहे थे | उद्घोषक ने घोषणा की कि अब तीन दिन से भूखा यह व्यक्ति भूख पर अपना वक्तव्य देगा | उसने उस व्यक्ति से कहा आप भूख पर अपने विचार विस्तार से रखें | इसके बाद आपको भोजन कराया जाएगा|
मैं भूखे वक्ता को मंच पर ले गया | वह ,इधर उधर देखने लगा | उसे बोलते न देख सभागार में उपस्थित जनों ने उसे हौसला देने के लिए बोलिए बोलिए मत घबराइए कहना आरंभ किया | मैं उसे हौसला  देने के लिए उसके पास गया उसके कंधे को आत्मीयता से थपकाया | आत्मीयता पा कर उसमें हलचल हुई | उसका हाथ पेट पर गया और वह अचानक हिलक कर रोने लगा |  उसका रुदन वक्तव्य सुन कर हर कोई भूख की वेदना को स्वयं में प्रविष्ट होते अनुभव कर रहा था हर कोई अवाक् था
|[12:34AM, 06/04/2015] jgdis Gupt:



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