Sunday, January 17, 2010

वसंत पंचमी की शुभ कामनाए

सरस्वती वंदना



भावनाओं में ,कामनाओं में ,शौर्य सुधा भर दे

वीणा वादिनी ,मातु शारदे ,,राष्ट्र भक्ति वर दे



नीति सन्मति ,सत्य संस्कृति ,सम-आदर ,विश्वास

समता-समरसता के पथ पर दृढ़ प्रतिज्ञ अनुप्रास

अजर-दिव्यता ,अतुल-भव्यता ,,'पूर्ण प्रतिष्ठा दे

सहयोगी सह-भागी भारत , संकुल निष्ठां दे



विज्ञ -तग्यता ,ओज, सभ्यता ,विनत विश्व आकाश

अंतर भारत के जीवन में ,प्रबल -प्रेम,नित्-हास

गुडानुरागी, व्यसन-विरागी तरुण ,सुविद्या दे

धर्मं-अधिष्ठित अखंड भारत ,योगी प्रज्ञा दे



समुचित वृष्टी ,नियमित ऋतुयें , धान, मान ,दिनमान

गौरव पूरित सदय ह्रदय में ,शक्ति-मान अभियान

आत्मा-चेतना , विश्व-योजना , श्रम-तत्परता दे

दुर्जन-हन्ता, सज्जन भारत ,, सत -उर्वरता दे

Monday, December 14, 2009

शब्दिका


सड़ने लगा पानी पुनह,
पुण्यघट रीते
देवता के द्वार से लौटे कलश रीते

पात्र का मंजन निरंतर ,
भावना से हृदय अंतर
सुद्ध सात्विकता के पुजारी ,
हो गए इतिहास बीते

कल क्रम से हारती हर जीत ,
आरती के उत्स का संगीत
साधना सातत्य का पर्याय ,
अवरोध और व्यतिक्रम पलीते

है समय की आत्मजा नियति ,
उम्र चढ़ते ही विदा 'सुमति'
भंवर भवरों को नहीं भांवर,
मधु विरत रसवंत सोम ही पीते

Wednesday, October 28, 2009

गीत


ह्रदय योग कर दे ,हमें मीत कर दे

चलो कोई ऐसा ,लिखें गीत, गायें।

सूखी पडी है, नहर नेह रस की

पतित पावनी गीत गंगा बहायें ॥


दृग्वृत पे मन के दिवाकर जी डूबे

उचटते हुए प्रीत बंधन हैं ऊबे ।

कुसुम चाव के ,घाव खाए पड़े हैं

गीत संजीवनी कोई इनको सुनाएँ ॥

ह्रदय योग कर दे ......

चकाचोंध चारों तरफ़ ,फ़िर भी कोई

तिमिर के घटाटोप पे आँख रोई ।

कहींपर निबलता कहीं भूख बिखरी

इन्हे ज्योति के गीत देकर जगाएं ॥

ह्रदय योग कर दे ......

घटाओं को तृप्ति बरस कर ही मिलती

हमीं पड़ गए संचयों में अधिकतम ।

इसी से हुए प्राण बेसुध विकल कृष

गीत अमृत इन्हें आज जी भर पिलायें ॥

ह्रदय योग कर दे ........

Thursday, October 1, 2009

शरद पूर्णिमा की शुभ कामनाये


चांदनी हो मुबारक सभी को चाँद आया है रस बरसाने
लेके अंगडाई अरमान जागे, फ़िर हरे हो गए हैं फ़साने

वक्त के घोल में तल्खियों को ,यूँ खंगाला बहुत वक्त मैंने
दाग दिल के मगर सख्त निकले ,आगये चांदनी में रुलाने

सूखी हुई झाडियों में ,आज खिल आई है फ़िर से कोंपल
उम्र दौडी है पिछली गली में ,गुजरे कल को गले से लगाने

हर सदी लेके आई सदी को ,बिना पूंछे ही नेकी बदी को
आप आए न दामन झटक कर,चांदनी आ गयी फ़िर बुलाने

याद के बुलबुले झाग बन कर, छा गए उम्र की वादियों में
आँख छलकीहै शायद तुम्हारी,बनके शबनम लगी मनभिगाने


Sunday, September 20, 2009

बतियाने से समय कटेगा , कदम उठें तो बात बनेगी


बतियाने से समय कटेगा ,
कदम उठें तो बात बनेगी

सोये रहजाना उचित नहीं ,

मत सोच कि कोई खरा नहीं
लहरों पर भी करो सवारी,,,,

उड़ना भी कुछ बुरा नही ।
किंतु न अपनी धरती छूटे,,

न जगती का छूटे मान
शत्रु से यदि रार न ठानी ,

रार स्वयं से आन ठनेगी

अन्यायी से मेल न करना ,

शक्तिमन्त्र को सदा पालना
बीज विजय का ,गीत प्रीत के ,

ऊँचें सपनों को सम्हालना
सज्जन शक्ति का संचय और

मदमत्ता का रखना ध्यान
किंचित भ्रम में मत रहना ,

धरती कोई अवतार जनेगी

खामोशी के अपने गहरे माने होते हैं जिन पर इसकी रहमत हो मस्ताने होते हैं

खामोशी के अपने गहरे माने होते हैं
जिन पर इसकी रहमत हो मस्ताने होते हैं

गिरते हैं कहकहे अचानक जब ठोकर खा कर
तब ही हम अपनी हस्ती पहचाने होते हैं

यारा दौरे दौड़ भाग की उलझन में तुम हो
पर जुबान पर दुनिया की तो ताने होते हैं

जब बन्दों का मिलन खुदाई से हो जाता है
तब किस्मत में सर्वत से बतियाने होते हैं

तेरी शोखी ,बिल्कुल जैसे धूप चटखती है
इसमे गाफिल गर्दू सब दीवाने होते हैं

Thursday, September 10, 2009

सीधी सच्ची बात

करे खनकती हंसी उजागर तुम भी खूब समझती हो
सीधी सच्ची बात कहूं तुम मुझ को अच्छी लगती हो


इन्द्रधनुष का रूप सजीला बारिश की बातें रिमझिम
साँझ सुहानी भोर सुनहरी पूनम रात बिखरती हो


चन्दन केशर नाग मुश्क का असर अर्श तक जा पहुंचे
उतरे हर धड़कन में सावन जब तुम साँझ संवरती हो


कच्ची है कचनार मगर ,,आँखों में शरारत आ बैठी
रह रह कर तुम बार बार छू छू के नज़र, गुजरती हो

गर्दूं भरने लगा कुलांचें ,,,,,हसरत ने पर फैलाये
ख्वाव ले रहे अंगडाई पर ,,,शायद शर्म ,मुकरती हो

LinkWithin

विजेट आपके ब्लॉग पर