Saturday, March 24, 2012
Saturday, February 27, 2010
अप्प होली भव:

यह होली का समय है। समय के रथ पर बैठकर परिवर्तन आता रहता है एक समय था जब उम्र जताने के लिए देखे हुए बसन्तों की गिनती बताई जाती थी। अब बसन्त देखने ही नहीं मिलते। बसन्त तो पेड़ों पर आता था। पेड़ जंगल में पाये जाते थे,अब जंगलात कागजों में बचे हैं। बसन्त, जंगल लीलने वालों के दरबाजों की चौखटों में जड़ा है । फर्नीचर बन के अलसाया पड़ा है । जंगलात के पूरे मंगलात और पूरी समृद्घि लिये वहीं आराम से रह रहा है। ए.सी.के इशारों पर बारहो महीने वहीं नाचता है।
जब बसंत नहीं बचा तो उम्र जताने के लिए होली दिवाली नै अपनी सेवाएं देना स्वीकार कर लिया। कुछ जी अपनी उम्र दीवाली से बताते हैं तो कुछ होली से। दीवाली से उम्र बताना भाग्यशालियों के भाग में आता है। जिनके भाग्य फूटे टूटे हैं उन्हें तो दीवाली मनाने के लिए भी होली की तरह जलना पड़ता है॥
होलिका असल में उन्ही की बहन थी हिरण्यकश्यप ने तो उसे चुनावी बहन बनाया था। चुनाव में तो जाने किस किसको क्या-क्या नहीं बनाना पड़ता। गधे को बाप कहना पड़ता है और खुद किसी-किसी को सुअर तक होना पड़ता है।
प्रहलाद उसी होलिका की गोद में पला बढ़ा था जो आम आदमी की आम बहन है जिसकी जान की और लाज की कीमत न कल थी न आज है जब तक आम बने रहेंगे उनका रस (खून)पिया जाता रहेगा यही व्यवस्था का राज है। आज प्रहलाद तो नहीं है लेकिन उसका भाई आह्लाद है। गरीब तिल तिल होलिका की तरह जीवित जलते हैं आह्लाद उसकी गोद से निकलकर हिरण्यकश्यप की उंगली थामे चलते हैं। किसान दिन रात मेंहनत कर फसलें उगाते हैं और बिचौलिये घर पर बैठकर उनके पसीने पर सट्टा लगाकर करोड़ों अरबों कमाते हैं।
समय के रथ पर बैठकर और भी परिवर्तन आये हैं। गरीब शब्द का एक पर्यायवाची कार्यकर्ता भी हो ेगया है। देश मे जितने भी राजनैतिक दल है उनके अधिकांश कार्यकर्ता सालभर होली मनाते हैं। वे अपने धन की समय की होली जलाते हैं। होलिका की भूमिका निबाहते है और नेताओं को हिरण्य(स्वर्ण) कच्छप बनाते हैं। हिरण्य पाकर नेता कच्छप हो जाते हैं। देश की समस्याओं, जनता के दुख के अंगारे उनकी कठोर पीठ का कुछ नहीं बिगाड़ पाते। कठोर जीवन की संभावना सामने आते ही वे तुरन्त अपना मूंह छुपाकर अपनी पीठिका पर वेशर्म निश्चल पड़े रहते हैं।
देश में आग लगी है महंगाई की लपटों से आम (जन) का रस जल रहा है, पेटों में भूंख की ज्वाला धधक रही है लेकिन हिरण्यकच्छप दीवाली मना रहा है। वह बम फोड़कर धमाके कर रहा है जब कार्यकर्ता जवाब मांगते हैं तब ये हिरण्यकच्छप फट से अपना दर्शन कराते हैं, अपना दर्शन सुनाते हैं।
प्रहलाद उसी होलिका की गोद में पला बढ़ा था जो आम आदमी की आम बहन है जिसकी जान की और लाज की कीमत न कल थी न आज है जब तक आम बने रहेंगे उनका रस (खून)पिया जाता रहेगा यही व्यवस्था का राज है। आज प्रहलाद तो नहीं है लेकिन उसका भाई आह्लाद है। गरीब तिल तिल होलिका की तरह जीवित जलते हैं आह्लाद उसकी गोद से निकलकर हिरण्यकश्यप की उंगली थामे चलते हैं। किसान दिन रात मेंहनत कर फसलें उगाते हैं और बिचौलिये घर पर बैठकर उनके पसीने पर सट्टा लगाकर करोड़ों अरबों कमाते हैं।
समय के रथ पर बैठकर और भी परिवर्तन आये हैं। गरीब शब्द का एक पर्यायवाची कार्यकर्ता भी हो ेगया है। देश मे जितने भी राजनैतिक दल है उनके अधिकांश कार्यकर्ता सालभर होली मनाते हैं। वे अपने धन की समय की होली जलाते हैं। होलिका की भूमिका निबाहते है और नेताओं को हिरण्य(स्वर्ण) कच्छप बनाते हैं। हिरण्य पाकर नेता कच्छप हो जाते हैं। देश की समस्याओं, जनता के दुख के अंगारे उनकी कठोर पीठ का कुछ नहीं बिगाड़ पाते। कठोर जीवन की संभावना सामने आते ही वे तुरन्त अपना मूंह छुपाकर अपनी पीठिका पर वेशर्म निश्चल पड़े रहते हैं।
देश में आग लगी है महंगाई की लपटों से आम (जन) का रस जल रहा है, पेटों में भूंख की ज्वाला धधक रही है लेकिन हिरण्यकच्छप दीवाली मना रहा है। वह बम फोड़कर धमाके कर रहा है जब कार्यकर्ता जवाब मांगते हैं तब ये हिरण्यकच्छप फट से अपना दर्शन कराते हैं, अपना दर्शन सुनाते हैं।
ये कहते हैं- देखो हम भी जल रहे हैं। ईष्र्या, द्वेष, अहंकार, वासना, और लालच की आग में हम भी जल रहे हैं। मगर हमें तो यह आग बड़ी मीठी लगती है, जैसे कि कड़क सर्दी में सुलगती सिगड़ी भली लगती है। तुम हमें बेवकूफ मत बनाओ। हमारी तरह जलकर होली नहीं, दीवाली मनाओ अगर यह नहीं कर सकते तो खुद में क्रोध की ज्वाला जलाओ, अप्प होली भव: का मंत्र अपनाओ और अपने आक्रोश की लपटों में इस व्यवस्था की गंदगी जलाओ।
लुटेरों को पहचानों, पकड़ो और वहिष्कार की आग में जलाओ वर्ना खुद ही जलो, जलते रहो। हमें होली पर दीवाली मनाने दो तुम अगर अवसर को नहीं भून पाओ तो हाथ मलते रहो।
Sunday, January 17, 2010
वसंत पंचमी की शुभ कामनाए
सरस्वती वंदना 
भावनाओं में ,कामनाओं में ,शौर्य सुधा भर दे
वीणा वादिनी ,मातु शारदे ,,राष्ट्र भक्ति वर दे
नीति सन्मति ,सत्य संस्कृति ,सम-आदर ,विश्वास
समता-समरसता के पथ पर दृढ़ प्रतिज्ञ अनुप्रास
अजर-दिव्यता ,अतुल-भव्यता ,,'पूर्ण प्रतिष्ठा दे
सहयोगी सह-भागी भारत , संकुल निष्ठां दे
विज्ञ -तग्यता ,ओज, सभ्यता ,विनत विश्व आकाश
अंतर भारत के जीवन में ,प्रबल -प्रेम,नित्-हास
गुडानुरागी, व्यसन-विरागी तरुण ,सुविद्या दे
धर्मं-अधिष्ठित अखंड भारत ,योगी प्रज्ञा दे
समुचित वृष्टी ,नियमित ऋतुयें , धान, मान ,दिनमान
गौरव पूरित सदय ह्रदय में ,शक्ति-मान अभियान
आत्मा-चेतना , विश्व-योजना , श्रम-तत्परता दे
दुर्जन-हन्ता, सज्जन भारत ,, सत -उर्वरता दे

भावनाओं में ,कामनाओं में ,शौर्य सुधा भर दे
वीणा वादिनी ,मातु शारदे ,,राष्ट्र भक्ति वर दे
नीति सन्मति ,सत्य संस्कृति ,सम-आदर ,विश्वास
समता-समरसता के पथ पर दृढ़ प्रतिज्ञ अनुप्रास
अजर-दिव्यता ,अतुल-भव्यता ,,'पूर्ण प्रतिष्ठा दे
सहयोगी सह-भागी भारत , संकुल निष्ठां दे
विज्ञ -तग्यता ,ओज, सभ्यता ,विनत विश्व आकाश
अंतर भारत के जीवन में ,प्रबल -प्रेम,नित्-हास
गुडानुरागी, व्यसन-विरागी तरुण ,सुविद्या दे
धर्मं-अधिष्ठित अखंड भारत ,योगी प्रज्ञा दे
समुचित वृष्टी ,नियमित ऋतुयें , धान, मान ,दिनमान
गौरव पूरित सदय ह्रदय में ,शक्ति-मान अभियान
आत्मा-चेतना , विश्व-योजना , श्रम-तत्परता दे
दुर्जन-हन्ता, सज्जन भारत ,, सत -उर्वरता दे
Monday, December 14, 2009
शब्दिका

सड़ने लगा पानी पुनह,
पुण्यघट रीते
देवता के द्वार से लौटे कलश रीते
पात्र का मंजन निरंतर ,
भावना से हृदय अंतर
सुद्ध सात्विकता के पुजारी ,
हो गए इतिहास बीते
कल क्रम से हारती हर जीत ,
आरती के उत्स का संगीत
साधना सातत्य का पर्याय ,
अवरोध और व्यतिक्रम पलीते
है समय की आत्मजा नियति ,
उम्र चढ़ते ही विदा 'सुमति'
भंवर भवरों को नहीं भांवर,
मधु विरत रसवंत सोम ही पीते
पुण्यघट रीते
देवता के द्वार से लौटे कलश रीते
पात्र का मंजन निरंतर ,
भावना से हृदय अंतर
सुद्ध सात्विकता के पुजारी ,
हो गए इतिहास बीते
कल क्रम से हारती हर जीत ,
आरती के उत्स का संगीत
साधना सातत्य का पर्याय ,
अवरोध और व्यतिक्रम पलीते
है समय की आत्मजा नियति ,
उम्र चढ़ते ही विदा 'सुमति'
भंवर भवरों को नहीं भांवर,
मधु विरत रसवंत सोम ही पीते
Wednesday, October 28, 2009
गीत

ह्रदय योग कर दे ,हमें मीत कर दे
चलो कोई ऐसा ,लिखें गीत, गायें।
सूखी पडी है, नहर नेह रस की
पतित पावनी गीत गंगा बहायें ॥
दृग्वृत पे मन के दिवाकर जी डूबे
उचटते हुए प्रीत बंधन हैं ऊबे ।
कुसुम चाव के ,घाव खाए पड़े हैं
गीत संजीवनी कोई इनको सुनाएँ ॥
ह्रदय योग कर दे ......
चकाचोंध चारों तरफ़ ,फ़िर भी कोई
तिमिर के घटाटोप पे आँख रोई ।
कहींपर निबलता कहीं भूख बिखरी
इन्हे ज्योति के गीत देकर जगाएं ॥
ह्रदय योग कर दे ......
घटाओं को तृप्ति बरस कर ही मिलती
हमीं पड़ गए संचयों में अधिकतम ।
इसी से हुए प्राण बेसुध विकल कृष
गीत अमृत इन्हें आज जी भर पिलायें ॥
ह्रदय योग कर दे ........
Thursday, October 1, 2009
शरद पूर्णिमा की शुभ कामनाये
चांदनी हो मुबारक सभी को चाँद आया है रस बरसाने
लेके अंगडाई अरमान जागे, फ़िर हरे हो गए हैं फ़साने
वक्त के घोल में तल्खियों को ,यूँ खंगाला बहुत वक्त मैंने
दाग दिल के मगर सख्त निकले ,आगये चांदनी में रुलाने
सूखी हुई झाडियों में ,आज खिल आई है फ़िर से कोंपल
उम्र दौडी है पिछली गली में ,गुजरे कल को गले से लगाने
हर सदी लेके आई सदी को ,बिना पूंछे ही नेकी बदी को
आप आए न दामन झटक कर,चांदनी आ गयी फ़िर बुलाने
याद के बुलबुले झाग बन कर, छा गए उम्र की वादियों में
आँख छलकीहै शायद तुम्हारी,बनके शबनम लगी मनभिगाने
लेके अंगडाई अरमान जागे, फ़िर हरे हो गए हैं फ़साने
वक्त के घोल में तल्खियों को ,यूँ खंगाला बहुत वक्त मैंने
दाग दिल के मगर सख्त निकले ,आगये चांदनी में रुलाने
सूखी हुई झाडियों में ,आज खिल आई है फ़िर से कोंपल
उम्र दौडी है पिछली गली में ,गुजरे कल को गले से लगाने
हर सदी लेके आई सदी को ,बिना पूंछे ही नेकी बदी को
आप आए न दामन झटक कर,चांदनी आ गयी फ़िर बुलाने
याद के बुलबुले झाग बन कर, छा गए उम्र की वादियों में
आँख छलकीहै शायद तुम्हारी,बनके शबनम लगी मनभिगाने
Sunday, September 20, 2009
बतियाने से समय कटेगा , कदम उठें तो बात बनेगी

बतियाने से समय कटेगा ,
कदम उठें तो बात बनेगी
सोये रहजाना उचित नहीं ,
मत सोच कि कोई खरा नहीं
लहरों पर भी करो सवारी,,,,
उड़ना भी कुछ बुरा नही ।
किंतु न अपनी धरती छूटे,,
न जगती का छूटे मान
शत्रु से यदि रार न ठानी ,
रार स्वयं से आन ठनेगी
अन्यायी से मेल न करना ,
शक्तिमन्त्र को सदा पालना
बीज विजय का ,गीत प्रीत के ,
ऊँचें सपनों को सम्हालना
सज्जन शक्ति का संचय और
मदमत्ता का रखना ध्यान
किंचित भ्रम में मत रहना ,
धरती कोई अवतार जनेगी
कदम उठें तो बात बनेगी
सोये रहजाना उचित नहीं ,
मत सोच कि कोई खरा नहीं
लहरों पर भी करो सवारी,,,,
उड़ना भी कुछ बुरा नही ।
किंतु न अपनी धरती छूटे,,
न जगती का छूटे मान
शत्रु से यदि रार न ठानी ,
रार स्वयं से आन ठनेगी
अन्यायी से मेल न करना ,
शक्तिमन्त्र को सदा पालना
बीज विजय का ,गीत प्रीत के ,
ऊँचें सपनों को सम्हालना
सज्जन शक्ति का संचय और
मदमत्ता का रखना ध्यान
किंचित भ्रम में मत रहना ,
धरती कोई अवतार जनेगी
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