Monday, April 15, 2013


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Wednesday, March 13, 2013

हो सकी इसलिए भ्रष्ट,मति भाई जी  सरकार की  

हो सकी इसलिए भ्रष्ट,मति भाई जी  सरकार की  
 करके केवल टिप्पणी  खाना पूरी हर बार की 
क्या कोइ उपकरण है कवि जी आपके पास 
जिसे साध कर बंध सके भारत का विश्वास 
भारत का विश्वास सदा पुरुषार्थ रहा है 
अपना अतीत संघर्षों का इतिहास रहा है 

 कौन  राष्ट्रहित प्रथम हमारा भाव खा  गया 
कैसे महापुरुष  वृद्धों में ईर्ष्या का भाव आ गया 
जब  सीख लिया हमने मूल्यों का पतन देखना 
एकान्तिक  जीवन में ही सुख व्यसन देखना 
हम दंड नहीं  दे सके तटस्थों को इस युग में 
इसीलिये है अधोगति हम सबकी इस युग में 

Thursday, March 7, 2013

जमीं  की बात करता हूँ जमीं  वालों की बात करता हूँ
जिनका वास्ता नहीं वतन से उनसे मुक्का लात करता हूँ

जमीर बेच के सर जमीं बेच के जो लोग जेवरों से लदे


अपने वजूद से मिलना ,अपनी ही सांसों में पिघलना

बहुत खूब लिख दिया है सफर नामे के साथ चलना

बधाई


देख तेरा दीवाना कैसे मारा मारा फिरता है 

देख तेरा दीवाना कैसे मारा मारा फिरता है 
घर से लेकर घाट तलक ये बेचारा फिरता है 

चाह  में तेरी चातक सा पीहू पीहू रटता है 
चौराहों से चौबारों तक आहें भरता फिरता है 

कई बरातें  हुईं सुहागन ,कितने गधे चढ़े घोड़ों 
वर मालाएं  मन में लेकर एक कुवांरा फिरता है 

यूँ  कहना अनुभूति  मुश्किल,, पर समझो 
गर्म धुप में नंगे तन पर ज्यूँ अंगारा फिरता है 

उसने तो मन बना लिया ,,तेरे गले लटकने का 
जबतक घर न बस जाये एक बंजारा फिरता है 

Saturday, February 27, 2010

अप्प होली भव:



यह होली का समय है। समय के रथ पर बैठकर परिवर्तन आता रहता है एक समय था जब उम्र जताने के लिए देखे हुए बसन्तों की गिनती बताई जाती थी। अब बसन्त देखने ही नहीं मिलते। बसन्त तो पेड़ों पर आता था। पेड़ जंगल में पाये जाते थे,अब जंगलात कागजों में बचे हैं। बसन्त, जंगल लीलने वालों के दरबाजों की चौखटों में जड़ा है । फर्नीचर बन के अलसाया पड़ा है । जंगलात के पूरे मंगलात और पूरी समृद्घि लिये वहीं आराम से रह रहा है। ए.सी.के इशारों पर बारहो महीने वहीं नाचता है।
जब बसंत नहीं बचा तो उम्र जताने के लिए होली दिवाली नै अपनी सेवाएं देना स्वीकार कर लिया। कुछ जी अपनी उम्र दीवाली से बताते हैं तो कुछ होली से। दीवाली से उम्र बताना भाग्यशालियों के भाग में आता है। जिनके भाग्य फूटे टूटे हैं उन्हें तो दीवाली मनाने के लिए भी होली की तरह जलना पड़ता है॥
होलिका असल में उन्ही की बहन थी हिरण्यकश्यप ने तो उसे चुनावी बहन बनाया था। चुनाव में तो जाने किस किसको क्या-क्या नहीं बनाना पड़ता। गधे को बाप कहना पड़ता है और खुद किसी-किसी को सुअर तक होना पड़ता है।
प्रहलाद उसी होलिका की गोद में पला बढ़ा था जो आम आदमी की आम बहन है जिसकी जान की और लाज की कीमत न कल थी न आज है जब तक आम बने रहेंगे उनका रस (खून)पिया जाता रहेगा यही व्यवस्था का राज है। आज प्रहलाद तो नहीं है लेकिन उसका भाई आह्लाद है। गरीब तिल तिल होलिका की तरह जीवित जलते हैं आह्लाद उसकी गोद से निकलकर हिरण्यकश्यप की उंगली थामे चलते हैं। किसान दिन रात मेंहनत कर फसलें उगाते हैं और बिचौलिये घर पर बैठकर उनके पसीने पर सट्टा लगाकर करोड़ों अरबों कमाते हैं।
समय के रथ पर बैठकर और भी परिवर्तन आये हैं। गरीब शब्द का एक पर्यायवाची कार्यकर्ता भी हो ेगया है। देश मे जितने भी राजनैतिक दल है उनके अधिकांश कार्यकर्ता सालभर होली मनाते हैं। वे अपने धन की समय की होली जलाते हैं। होलिका की भूमिका निबाहते है और नेताओं को हिरण्य(स्वर्ण) कच्छप बनाते हैं। हिरण्य पाकर नेता कच्छप हो जाते हैं। देश की समस्याओं, जनता के दुख के अंगारे उनकी कठोर पीठ का कुछ नहीं बिगाड़ पाते। कठोर जीवन की संभावना सामने आते ही वे तुरन्त अपना मूंह छुपाकर अपनी पीठिका पर वेशर्म निश्चल पड़े रहते हैं।
देश में आग लगी है महंगाई की लपटों से आम (जन) का रस जल रहा है, पेटों में भूंख की ज्वाला धधक रही है लेकिन हिरण्यकच्छप दीवाली मना रहा है। वह बम फोड़कर धमाके कर रहा है जब कार्यकर्ता जवाब मांगते हैं तब ये हिरण्यकच्छप फट से अपना दर्शन कराते हैं, अपना दर्शन सुनाते हैं।
ये कहते हैं- देखो हम भी जल रहे हैं। ईष्र्या, द्वेष, अहंकार, वासना, और लालच की आग में हम भी जल रहे हैं। मगर हमें तो यह आग बड़ी मीठी लगती है, जैसे कि कड़क सर्दी में सुलगती सिगड़ी भली लगती है। तुम हमें बेवकूफ मत बनाओ। हमारी तरह जलकर होली नहीं, दीवाली मनाओ अगर यह नहीं कर सकते तो खुद में क्रोध की ज्वाला जलाओ, अप्प होली भव: का मंत्र अपनाओ और अपने आक्रोश की लपटों में इस व्यवस्था की गंदगी जलाओ।
लुटेरों को पहचानों, पकड़ो और वहिष्कार की आग में जलाओ वर्ना खुद ही जलो, जलते रहो। हमें होली पर दीवाली मनाने दो तुम अगर अवसर को नहीं भून पाओ तो हाथ मलते रहो।

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