सरस नदी सी बहती हो
मेरे मन में रहती हो
मैं पत्थऱ घाट किनारे का
तुम छ्ल छ्ल छूती रहती हो
विहगों सी है ऊंची उड़ान
कोकिल कंठी सुर मधुर तान
विमल नवल तुम धवल कंवल
मैं कंटक युति सांवल सेमल
तुम शांत सरल मर्यादा में
मुझे पल पल सहती रहती हो
हिरण्यमयी द्युतिं कांति किरण
मोहक मृदुला मधुहास अरूण
तुम हो प्रभात की शुभ बेला
में काम क्रोध मद मंद-पुंज
मै हूं ज्वर का उत्ताप श्रृंग
तुम दल -दल झरती रहती हो
रति-स्पर्शो की अनुभूति
अंतरतम शीतल करती है
तुम सुमन कली सी लज्जा में
मैं बौराया सा भंवरा हूं
संकोच मोच न हो पाया
तुम कल कल करती रहती हो
ललित ललक दृष्टित अपलक
तुम कृष्णबिंदु दिक् दैव झलक
तुम संदल वन की मलय पवन
में नगर सभ्यता का उपवन
खोकर मुझमें अपना वैभव
स्व, हल-हल .पीती २हती हो
महामना जगुप्त
अनुमानित सितम्वर1985-2019अप्रेल
No comments:
Post a Comment