17/04, 16:40] mahamna: चांद का रहता चित्त अधीर उभरती है रातों में पीर दृगबिंदु में दुख का सागर धरूं मैं कैसे धीर उभरती है रातों में पीरदेख नदी की विकल निबलता बादल जल भर लाए तटबंधों के अतिक्रम तोड़े किंतु लक्ष्य न पाए बहुत गंद तो बहा ले गई फिर भी रही विफल जिन नदियों को मां कहते हैं उघड़े उनके चीर देख रहा हूं लुटी मनुजता दानवदल का शोरश्रम सीकर के मानहरण निर्लज्जित हठ घनघोर ऊपर ऊपर यश गाथाएं 'तल में अपयश कीच केतु बांट रहे परसादी वंचित देवों से खीरअनय के आगे खड़े विनयवत छत्रप शूद्र सवर्ण दुर्योधन के रक्षक बनकर खड़े हुए हैं कर्ण मंत्रों की विकृत आवृतियां आएं कैसे देवकैसे जीते सत्य सनातन रण चूक रहे अब वीर[17/04, 16:40] mahamna: तुम हो हम हैं और हमारे साथ हमारी पीड़ाएं आओ सुख की करें प्रतीक्षा तब तक इनको ही गाएंअभी खौल है अपने भीतर पकने पर रस आएगा गर्मी वर्षा शिशिर सहेंगे तब बसंत मुस्काएगा साथ-साथ हैं यही बहुत है पल-पल को मधुमास बनाएं तुम हो हम हैं और हमारे साथ हमारी पीड़ाएं आओ सुख की करें प्रतीक्षा तब तक इनको ही गाएं चांद को देखो पूनम की हर मास प्रतीक्षा करता है पूरा खिलाने से पहले हर एक अमावस मरता है न रात रहे न ग्रहण रहे उत्सव प्रिय नित्य मनाएं तुम हो हम हैं और हमारे साथ हमारे पीड़ाएंआओ सुख की करें प्रतीक्षा तब तक इनको ही गाएं जिनसे सूरज भी हुआ पराजितउन कोनों का ध्यान करो पीर पराई पीने कोकुछ अपने हित बलिदान करोतुम स्नेह बनो, मैं बनूं वर्तिकातम से इनको मुक्ति दिलाएं