Thursday, March 26, 2020

घरवाली और घरवाले में  दंगा हो गया 
बीवी निकली दबंग आदमी नंगा हो गया
 
गुस्ताखी बस इतनी सी पतिदेव ने कर दी
 मांगा था नेकलेस हाथ में लाकर चैन ही धर दी
चैन भी क्या थी दुबली पतली दो तोले की माशा 
इसी बात पर सुबह शाम का हो गया खूब तमाशा
ऐसा मिला निखट्टू इससे कौन लगाऊं आशा
हाय हाय बादाम बताकर पकड़ा दिया बताशा
होली हुई दिवाली में और दिवाली....होली
पूरा सीजन निकला , वैलेंटाईन कतई न बोली
जी भर कोसा गाली भी दी और बहाई गंगा
धू-धू करके शंमा जली और साथ में जला पतंगा
फिर चैन वैन सब उजड़ा पंगा हो गया
एक दिन किसी के घर में यूं दंगा हो गया

बड़े चैन से कटते थे दोनों के दिन रात
घूमते फिरते रहते थे लिए हाथ में हाथ
हम हैं लैला मजनू ..कभी ना छूटे अपना साथ
खाया करते थे यूं कसमें बात बात बेबात
कल्लू कालू पर करती  थी गोरी जब बरसात
देख देखकर जलती थी रंडवो की बारात
देख एक विज्ञापन हीरा सदा के लिए है
बोलगया फिर बड़ा -"निछावर" अदा के लिए है
दौड़ा भागा पति बहुत पर हुआ ना कोई जुगाड़
यूं चांदी का चमचा  आखिर हो के रहा कबाड़
रांझा बन गई बिल्ला हीर भी रंगा हो गया
एक रोज किसी के घर में यूं दंगा हो गया

ऐसा उनमें मेल मिसाले देते थे सब लोग
पीस पीस कर दांत मसलते थे हाथों को लोग
लेते थे चटकारे भर भर के मस्साले लोग
हुआ नहीं वह भी कहते थे दिल के काले लोग
लगी निगोड़ी हाय बद्दुआ जब उसे मिला वेटेज
करते हैं जो प्यार घणी से घर लाते हैं प्रेस्टेज
प्रेस्टीज का प्रश्न बन गया कुकर ने मारी सिट्टी
होना था फिर वही हुआ पति को लग गई पट्टी
आखिरकार  मोहब्बत उन ने इस तरह से खर्ची 
इस ने ले ली हाथ में मिट्टी उसने ले ली मिर्ची
बचे न सर पर बाल  बेचारा "कंघा" हो गया.
एक रोज  किसी के घर में यूं दंगा हो गया

Monday, March 23, 2020

मन में पीड़ाएं बहुत हैं क्या कहें और क्या सुनेंछ्ल रहे हैं हम हमें ही क्या गुनें और क्या चुनें ?

मन में पीड़ाएं बहुत हैं क्या कहें और क्या सुनें
छ्ल रहे हैं हम हमें ही क्या गुनें और क्या चुनें ?

छांह तो मिलती है लेकिन राह खो जाती यहां
सम्वेदना भी वेदना के साथ सो जाती यहां
श्रमशील उद्यमिता जुटी है ताम्रपत्रों के लिए
और विलखता है इधर जीवन चरित्रों के लिए
आश्रमों में भगदड़े है होड़ वैभव के लिए
और तिरस्कृत त्याग तकता राह आश्रय के लिए
मन बसा है मूल्य में और तन रमा सुविधाओं में
श्रेष्ठंता निकृष्टता में भेद करना है कठिन
साधनों ओर साधना में आज हम किसकी सुनें

प्रश्नवाचक हो गए हैं मित्र भी और शत्रु भी
खो गए हैं धैर्य सारे धर्म के सब सूत्र भी
कुछ ढूढ़ना सभव नहीं जब दृष्टि ही अन्यत्र है
नवकुसुम की गंध में मदअंध करता इत्र हैं
गुरूपीठ पर है विकृ दर्पण लोभ मय है साधना
रस कहां से पाए जीवन समरस नहीं जब भावना
मुख फंसा है व्यंजनों में सुख है सरल अभिधाओं में
अनुशासितो भयशासितो में भेद करना है कठिन
अनुभूति या विभूतियों में हम कहो क्रिसकी सुने

गीत तो उगते हैं लेकिन लय तनिक सधती नहीं
बांसुरी खुलती है तो मृदुअंग बजती ही नहीं
भोग से भागा मगर जोग सध पाया नहीं
रात आधी हो चली  मन लौट कर आया नहीं
कैसे काटेंगे फसल जब बीज ही बोया नहीं
व्यासत्व  संभव ही नहीं निजता को यदि खोया नहीं
किसकी मानें प्रेम की या राज की दुविधाओं में
क्या सुखद है क्या दुखद है भेद करना है कठिन
चाहना और चेतना में अब हम कहो किसकी सुनें

महामना२४/३/१९  २:२२ अपरान्ह

Tuesday, December 31, 2019

शौक ये उम्रsभर लगाए रहिएमिजाज इश्किया बनाए रहिए बड़ा

शौक ये उम्रsभर लगाए रहिए
मिजाज इश्किया बनाए रहिए 

बड़ा एहसान आपका होगा
हमको सीने से लगाए रहिए

बड़ी बारीक है नज़र उनकी
उनसे कुछ फासले बनाए रहिए

हर कदम फूल खिलेंगे , तय  है 
अपनी ये शोखियां बचाए रहिए

रफ्ता रफ्ता मुकाम तय होंगे
दिल में  बस मंजिले बसाए २हिए

Sunday, August 25, 2019

कारवां ए-तूफां गुजारा कहां है

बड़े दिनों के बाद अफातु भाषा की एक रचना

कारवा ए तूफां गुजारा कहां है
अभी संग ढ़ग से उछाला कहां है

उड़ जाएगें तमाम हमामों के पर्दे
अभी जोश ने जोश पाला कहां है

अभी अपने अहलेअहद में हैं बैठे
औ कोई परचम निकाला कहां है

गुलूकार हम भी    हैं    माहिरे फन
हमें  मौसिकी  ने संभाला कहां   है

ऐ  ग़रदूं  गज़ल  तेरी  है  ये अधूरी
अभी  इश्क   इसमें  डाला कहां है

जब से तुमने राम कहा

जब से तुमने राम कहा , राम हुआ जाता हूं
प्रस्तर था सम्मुख तेरे प्रतिमान हुआ जाता हूं

उजला उजला कह कर, सारी कालिख धो दी
कीचड़ कीचड़ अंगनांई में तुलसी तुलसी बो दी
आलोकित मंदिर कर डाला ज्योतित कर दी कुटिया
जर्जर जीवन अभिलाषा को दे दी एक लकुटिया
दूषित कलुषित अपयश था यशगान हुआ जाता हूं
कामुक था सम्मुख तेरे निष्काम हुआ जाता हूं

जब से तुमने राम कहा , राम हुआ जाता हूं
प्रस्तर था सम्मुख तेरे प्रतिमान हुआ जाता हूं

प्रियवर प्रियवर कह कर मेरे कांटे सभी निकाले
क्रोध घृणा मत्सर नकार के शांत किए सब छाले
नेह प्रीत अभिसिंचित कर द्वेष और क्लेष बहाया
हीन पतित जग जीवन में उत्स और मोद जगाया
गरलताल था ,अमृतसर रसखान हुआ जाता हूं
अरिसुर था सम्मुख तेरे लय धाम हुआ जाता हूं

जब से तुमने राम कहा , राम हुआ जाता हूं
प्रस्तर था सम्मुख तेरे प्रतिमान हुआ जाता हूं

"महामना" जगदीश गुप्त

Wednesday, June 26, 2019

उर्दू एक विशलेषण

खाद्य वैज्ञानिक अन्वीक्षण अनुसंधान करके यह बताते हैं
कि कुछ मिश्रण औषधि बन जाते हैं
किंतु
कुछ मिश्रण घातक विष बन जाते हैं

इस पटल पर भाषा पर  प्रयोग करने वाले वैज्ञानिक हैं
आपने भी भाषा के प्रभावों को अनुभव किया होगा

कुछ  अन्वीक्षण अनुभव मेरे भी हैं
आपके अनुभव में इनका विस्तार या प्रतिकार जो भी हो कृपा कर साझा करेंगें

अखंड भारत के विभाजन के लिए अनेक अध्येता इस्लाम को उत्तर दायी ठहराते हैं
किंतु बांग्लादेश के जन्म का अनुभव इसका खंडन करता है
बांग्लादेश बना क्यों कि उर्दू भाषी बांग्लाभाषी को अपने ऊपर स्वीकार नहीं कर सकते । संवैधानिक रूप से बहुमत में आने के उपरांत भी अपना नेता नहीं मान सके । बांग्ला भाषियों को स्वयं से हीन व निम्न मानने की ग्रंथि उनमें थी ।

अर्थात अपवाद छोड़कर अन्य भाषाओं व भाषियों पर प्रभुत्व की लालसा उर्दूभाषियों में होती है

ऐसा क्यों होता होगा

कुछ कारण ध्यान में आते हैं

उर्दू का अर्थ छावनी है और यह शब्द छावनीमें बोली जाने वाली भाषा के लिए रूढ़ हो गया है।
छावनी युद्ध के लिए निकले सैनिकों के पड़ाव को कहते है
युद्धरत की सैनिक मानसिकता ही उर्दू बोलने वाले की मानसिकता बन जाती है अपवाद छोड़ कर ।

वैसे तो उर्दू एक बोली के रुप में विकसित हुई थी क्यों कि भारत के राज्यो को लूटने आए मूल लुटेरे आक्रमणकारी ' ,सैनिक व सेनापति रेगिस्तानी राज्यों यथा अरबी फारसी या तुर्की भाषाई होते थे । उन्हें आपस में व  भारतीय नागरिको विशेषकर स्थानीय स्तर पर नियोजित गए स्थानीय सैनिकों व सहायकों व दासों से संवाद के लिए प्रयास करने होते थे । इन्हीं प्रयासों में हिंदी वाक्य विन्यास में आक्रमणकारी सैनिक अपनी भाषाओं के शब्द भी प्रयोग करते थे I नियमित उपयोग होने से स्थानीय सेवको व सैनिकों ने यह शब्द सीख लिए।
वे अपने स्वामियों / सेनापतियों को प्रसन्न करने अधिकाधिक शब्द प्रयोग कर उनकी कृपा व पुरूस्कार पाने का प्रयास करते।
आज भी उर्दू रचनाकारों व बोलने  वालों के मन में यह चाटुकारिता का भाव व पुरस्कार का लालच महत्वपूर्ण कारण होता है

शेष ..

भारत में तब भी विशुद्ध अरबी विशुद्ध फारसी व विशुद्ध तुर्की साहित अनेक विदेशी भाषाओ के विद्वान थे । व्यापार व राज्यकी सुरक्षा के लिए यह आवश्यक भी था ।

तू जला दे शौक से ग़रदूं को घर का गम नहीं पर ये वादा कर यहां से रोशनी ले जाएगा तेरे घर चूल्हा जले जलती रहें आंते मेरी मुस्कुरा लूंगा अगर भर पेट तू मुस्काएगा

तू जला दे शौक से ग़रदूं को घर का गम नहीं
पर ये वादा कर यहां से रोशनी ले जाएगा
तेरे घर चूल्हा जले जलती रहें आंते मेरी
मुस्कुरा लूंगा अगर भर पेट तू मुस्काएगा

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