Monday, November 24, 2025

विपरीत दृष्टि को 'पतन' , , 'उत्थान' दिखता है शातिरों को बड़ा शातिर सदा भगवान दिखता है ऐब दिखते हैं औरो में अमल में फर्क रखते हैं आइने में नहीं इनको अपना शैतान दिखता है जलन में जल गए इतने जला डाला वतन अपनाअल्फलाह के लिए , , जलजला ईमान दिखता है खातिरेअल्फलाही के न जाने कामयाबी की इनकी है कौन पैमाईशजिंदगी जहन्नुम करके दीन परवान दिखता हैगर्द से भर गया ग़रदूं जमीं पर पट गई लाशेंवहशतों दहशतों में कौन सा सम्मान दिखता हैहरकते कायराना को शबाबे-दीन मत समझोनजरें खुदा ये कारनामा अहमकान दिखता है बेशर्मी की हद होती है इनके आगे वह भी रोती है ऐतबार तो कोई न करताबदकारी इनको ढोती है सिर्फ नफरते और नफरते मक्कारी से शब होती हैबाल सुअर का पड़ा दीद मेंइनको लगता वह मोती है जबजब मोदी का यश होताखुल जाती इनकी धोती हैमम

विपरीत दृष्टि को 'पतन' ,   ,  'उत्थान' दिखता है 
शातिरों को बड़ा शातिर सदा भगवान दिखता है 

ऐब दिखते हैं औरो में    अमल में फर्क रखते हैं 
आइने में नहीं इनको  अपना  शैतान दिखता है 

जलन में जल गए इतने जला डाला वतन अपना
अल्फलाह के लिए , , जलजला ईमान दिखता है 
खातिरेअल्फलाही के 

न जाने कामयाबी की  इनकी है   कौन पैमाईश
जिंदगी जहन्नुम करके     दीन परवान दिखता है

गर्द से भर गया ग़रदूं       जमीं पर पट गई लाशें
वहशतों दहशतों में कौन सा सम्मान दिखता है

हरकते कायराना को    शबाबे-दीन मत समझो
नजरें खुदा  ये कारनामा   अहमकान दिखता है  

बेशर्मी की      हद होती है 
इनके आगे वह भी रोती है 

ऐतबार तो  कोई न करता
बदकारी     इनको ढोती है 

सिर्फ नफरते और नफरते 
मक्कारी से   शब होती है

बाल सुअर का पड़ा दीद में
इनको लगता  वह मोती है 

जबजब मोदी का यश होता
खुल जाती  इनकी  धोती है

मम

Friday, June 20, 2025

स्पान्टेनियस फ्लो के तीन गीत

स्पॉन्टेनियस फ्लो के तीन गीत
1
गीत गाना धन कमाना बस यही तो काम है
बेचते हैं वीर रस भी लक्ष्य केवल दाम है ।

बुझ चुके है प्रज्ञ-चक्षु संवेदना का तंत्र विकृत
राज्य के चरणों में बैठे श्री राम के कापुरुष वंशज
राजदासों में अवस्थित राम के कापुरुष वंशज
जाति पर लड़ने को उद्यत राक्षसों से संधि तत्पर
वेदांत के थाती न सम्हली चर्वाक जैसे काम है 
ज्वालामुखी हैं ईर्ष्या के श्रीबुद्ध के सहगाम है

लिख रहे नित पोथियां दृष्टि में याचन प्रशस्ति
सिद्ध वाणी हो गई तो अहमन्यता में धंस गए 
कई उलूकाचार्य बैठे व्यास जी की पीठ पर 
वीरता गानी थी जिनको गा रहे वे काम हैं
काम लोभी दाम लोभी बेचते अध्यात्म हैं

साकार हो जाए सृजन कृत्य हो जाए कथानक
दुष्ट के संहार को "कोदंड" हो जाए विचारक
बन सुदर्शन स्वयं काटे दल सनातन शत्रु के
लेखनी हो सार्थक तब धन्य वन्दे मातरम्
नटराज के साधन सघन कृष्ण के अनुगाम है
कह सकेंगे गर्व से आराध्य अपने राम हैं 

2

कैसे लोकतंत्र में हम है 
कुलघाती को सम अधिकार 
नैतिकता का और पतन क्या
संहिताओ का यह व्यभिचार

जिसने अपहृत कर विधान को
(कु )शोधन विधान कर डाला
रक्षक बन कर वही घूमता
जपता संविधान की माला 
इससे और अधिक क्या होगा
नैतिकता का बलात्कार 

समदर्शी का स्वांग रचाए 
एकांगी दृष्टि से काना
ठगी की सब उपमाएं छोटी
ऐसे षड़यंत्रो को ताना 
अदलबदल कर बाने अपने
आतुर है बनने सरकार

कहता है निरपेक्ष स्वयं को 
 एक पक्ष को काट रहा है
फिरे घूमता आग लगाता 
जाति कौम में बांट रहा है 
ऐसा कैसा विरू विपक्ष है 
शत्रु सा जिसका व्यवहार

3

रेगिस्तानों के गुलाम ओ
मत करो प्रदूषित बंग को
निगल जाएगा दावानल सब
हवा न दो इस जंग को 

गिरगिट जैसे मत बांचो
मजहब की कितआब को
फल कर्मो का मिलता ही है
मत भूलो इस पाठ को
माहौल बिगड़ने से पहले
लुढ़काओ विषैले रंग को 

मकसद का हो गया खुलासा
कठपुतली किरदार सियासी
गोद में जा बैठे हो उसकी
दी जिसने मजहब को फाँसी 
अंजाम सोच लो क्या क्या होगा
तुम बांट रहे जिस भंग को

ख्वाब एक कश्मीर का
ले उड़ा आबरू पाक की
तुमकों भी लेकर डूबेगी 
आहें हिंदू ए बंगाल की 
मत तांडव को करो निमंत्रित
करो न दूषित गंग को 

.

रेगिस्तानों के ओ कासिद

मम

Wednesday, May 28, 2025

विनय न मानत जलधि जड़ ये लातो के मीतचाकर से मत आस कर भय बिन होय न प्रीत हम अनुगामी थे शौर्य के सिंहो के आदर्शभेड़ो के अनुगमन के हम कब हुए प्रदर्श करते रहो सवाल कि जब तक स्याही न जाए सूखमृगतृष्णा है आस कि जिनको धन मद पद की भूख

विनय न मानत जलधि जड़  ये लातो के मीत
चाकर से मत आस कर भय बिन होय न प्रीत

हम अनुगामी थे शौर्य के सिंहो के आदर्श
भेड़ो के अनुगमन के   हम कब हुए प्रदर्श

करते रहो सवाल कि जब तक स्याही न जाए सूख
मृगतृष्णा है आस कि जिनको धन मद पद की भूख

Saturday, May 24, 2025

छू दोगे गर लव से तुम ये कलाम गजल हो जाएगाकरो कुबूल मुहब्बत से ये सलाम गजल हो जाएगा हर इक सीने में इक दिल हर दिल में इक नाम रहेजिस नाम को दोगे अपना दिल वो नाम गजल हो जाएगामिलन के कई बहाने ग़रदूं ईद दीवाली होली हैआओगे जिस काम से मिलने वो काम गजल हो जाएगा

छू दोगे गर लव से तुम ये कलाम गजल हो जाएगा
करो कुबूल मुहब्बत से ये सलाम गजल हो जाएगा 

हर इक सीने में इक दिल हर दिल में इक नाम रहे
जिसको दोगे अपना दिल वो नाम गजल हो जाएगा

मिलन के कई बहाने ग़रदूं ईद दीवाली होली है
मिलने की जो वजह बने वो काम गजल हो जाएगा

Tuesday, September 17, 2024

हृदय पटल के पग पग पर सुधियों का मेला है फिर से आ गई होली फिर से मन रंगीला है भंवरे तितली फूल और कलियां सब हैं मस्ती में गली गली मदमाया मौसम डोले बस्ती मेंरंग अबीर घुला रग रग में मन की मौजो में बूढ़ा बरगद बाबू सोना हुआ सजीला हैकीच बना श्रृंगार आज हुड़दंगी टोली कागल गलौच है अलंकार इठलाती बोली काहोड़ ले रहा महलो से उल्लास भी खोली काबाहर तन और अन्तर्मन सब गीला गीला हैपुलक रहा है अंग अंग बिना पिए ही भंगमन करता मनुहार करे कोई आज मुझे भी तंगजीत वार दूं आ दुलार दूं करू न कोई जंगचूक न जाना होली का त्यौहार नशीला है जय होली जय जय प्रहलाद जय रंगोत्सव जय आह्लादआज जोड़ लें टूटे पुल पार करें कर लें संवादराजनीति को हद बतला दें राग राग में करें निनादसमरसता का उत्सव यह कान्हा की लीला हैमम

पग पग हृदय पटल पर सुधियों का मेला है 
ऑगन में होली द्वारे पर संत रंगीला है

भंवरे तितली फूल और कलियां सब हैं मस्ती में 
गली गली मदमाया मौसम डोले बस्ती में
रंग अबीर घुला रग रग में  मन की मौजो में 
बूढ़ा बरगद बाबू सोना हुआ सजीला है

कीच बना श्रृंगार आज हुड़दंगी टोली का
गल गलौच है अलंकार इठलाती बोली का
होड़ ले रहा महलो से उल्लास भी खोली का
बाहर तन और अन्तर्मन सब गीला गीला है

पुलक रहा है अंग अंग  बिना पिए ही भंग
मन करता मनुहार करे कोई आज मुझे भी तंग
जीत वार दूं आ दुलार दूं करू न कोई जंग
चूक न जाना होली का त्यौहार नशीला है 

जय होली जय जय प्रहलाद जय रंगोत्सव जय आह्लाद
आज जोड़ लें टूटे पुल पार करें कर लें संवाद
राजनीति को हद बतला दें राग राग में करें निनाद
समरसता का उत्सव यह कान्हा की लीला है

हृदय पटल के पग पग पर सुधियों का मेला है 
फिर से आ गई होली फिर से मन रंगीला है 

मम

Saturday, September 7, 2024

दोहे

मूरखन के संसार में     ज्ञानी की है मौज
विज्ञान कला के पीछे भागे जग की फौज

अंतर क्या है ठगी से भक्ति का बतलाओ
कहे कहे में ना चले करके भी दिखलाओ

कवि प्रवाचक भांजते आपस में क्यों लट्ठ
दोनों खावें शब्द की        भक्त पड़े हैं पट्ट

गाली देने में भला       लगे न एक छदाम
एक शब्द निकसे नही लगे यदि कुछ दाम

देख लिफाफा भरकमी  कवि कर ले कन्ट्रोल
.दिन तेरा भी आएगा        लग जाएगा मोल

Monday, September 2, 2024

एक प्रतिक्रिया

नजरूल इस्लाम 'की मूर्खतापूर्ण  नज़्म पर एक प्रतिक्रिया 

पढ़ने का समय नहीं है 
न उत्सुकता न जिज्ञासा
शब्द प्रयोग से पहले 
न जाना अर्थ न परिभाषा

जिनके लिए ग्रंथ किताब का अर्थ एक है
क्यों कि उनके लिए बहन बेटी मां बहू पत्नी एक है 
ऐसी बीमार सोच और दृष्टि है जिनकी 
उनके लिए अर्जन और विसर्जन भी एक है
जिन्हें दंडित करना है मानवता के लिए 
सरासर मूर्खता है उनसे करना 
कोई भी सकारात्मक आशा 

जो देने वाले के प्रति भी आभारी नहीं हो पाते
जिस थाली में खाते उसमें छेद करते नहीं लजाते
क्यों कि कपट और लूट जिन के साधन
और को गैर कह जीने का अधिकार नहीं दे पाते 
जिन शैतानों को रोकना है नेक जीवन के लिए 
सरासर मूर्खता है उनसे करना 
कोई भी सकारात्मक आशा

Posted on face book on date 1 / 9 / 24


कायर कोरी बाते करतेकरते रहते तूम तड़ाकधरें हथेली प्राण होमनेकरें लड़ाके धूम धड़ाकबड़ी बड़ी कविताए लिखतेलिखते बड़े बड़े आलेखलिए चाहना एक हृदय मेंहो जाए कोई उल्लेखमृतक हृदय से निकले अक्षर कैसे प्रेरण दे पाएंगेपंच सितारा के चमगादडक्या रणभेर बजा पाएंगेगाल बजाने वाले गालवगांडीव उठाएंगे कैसे डस आएंगे शत्रु कोबरेपल विपलो में फट्ट फड़ाक

कायर कोरी बाते करते
करते रहते तूम तड़ाक
धरें हथेली प्राण होमने
करें लड़ाके धूम धड़ाक

बड़ी बड़ी कविताए लिखते
लिखते बड़े बड़े आलेख
लिए चाहना एक हृदय में
हो जाए कोई उल्लेख
मृतक हृदय से निकले अक्षर
 कैसे प्रेरण दे पाएंगे
पंच सितारा के चमगादड
क्या रणभेर बजा पाएंगे
गाल बजाने वाले गालव
गांडीव उठाएंगे कैसे 
डस आएंगे शत्रु कोबरे
पल विपलो में फट्ट फड़ाक

Posted on face book at 1 /9/ 24

Sunday, August 25, 2024

बड़े दिनों के बाद अफातु भाषा की एक रचनाकारवा ए तूफां गुजारा कहां है अभी संग ढ़ग से उछाला कहां हैउड़ जाएगें तमाम हमामों के पर्देअभी जोश ने जोश पाला कहां हैअभी अपने अहलेअहद में हैं बैठे औ कोई परचम निकाला कहां हैगुलूकार हम भी हैं माहिरे फनहमें मौसिकी ने संभाला कहां हैऐ ग़रदूं गज़ल तेरी है ये अधूरीअभी इश्क इसमें डाला कहां है

बड़े दिनों के बाद अफातु भाषा की एक रचना

कारवा ए तूफां गुजारा कहां है 
अभी संग ढ़ग से उछाला कहां है

उड़ जाएगें तमाम हमामों के पर्दे
अभी जोश ने जोश पाला कहां है

अभी अपने अहलेअहद में हैं बैठे 
औ कोई परचम निकाला कहां है

गुलूकार हम भी    हैं    माहिरे फन
हमें  मौसिकी  ने संभाला कहां   है

ऐ  ग़रदूं  गज़ल  तेरी  है  ये अधूरी
अभी  इश्क   इसमें  डाला कहां है

Face book post 
25/8/2017

Saturday, August 24, 2024

दुर्गा

जो पंचाग नहीं देखते मुर्गे वही हैं
जो सर झुकाए मानते गुर्गे वही हैं
भरने जो तत्पर खड़ी खप्पर लिए
रक्त अपराधी का पीने दुर्गे वही हैं

Saturday, August 17, 2024

लालकिला / मणिपुर/ सियासत गजल 16 अगस्त 2023 को फेसबुक पर पोस्ट

लालकिला / मणिपुर/ सियासत

मेले हैं झमेले हैं अकेले हैं यहां इस दुनियादारी में
बहुत कुछ, रखना पड़ता है, यहां पर पर्दादारी में

तौल-ले-बोल तभी मुंह खोल इल्मदां आए हैं  कहते
सियासत कब जला दे क्या ? तेरी, ईमानदारी में 

वो आए घर,बराएशौक,किया सिजदा,दिया सदका 
तोहमतें,, नाम कर दी, फिर ,मेरी तीमारदारी में

सांप की बस्तियों में ,खोल ,दरखिड़कियां रखिए
इरादा जो भी हो ,शक है ,सलह में ,समझदारी में

तोडेगा न छोड़ेगा  , रहे कोई , दोस्त  या  दुश्मन 
सियासत दुश्मनों से ,और मुहब्बत फूल  यारी में 

ग़रदू

Tuesday, August 13, 2024

जिद के आगे जीत है चिढ़ के आगे हार जीत एक संगीत है ...हार एक फटकार पानी सा निर्मल मिले संतों का व्यबहारमिलते मिलते धुल गए दाग बिना व्यापारहार खेल की सम लगे रण में है धिक्कारउत्सव में आनन्दमय प्रेमी को स्वीकार

जिद के आगे जीत है चिढ़ के आगे हार 
जीत एक संगीत है ...हार एक फटकार 

पानी सा निर्मल मिले संतों का व्यबहार
मिलते मिलते धुल गए दाग बिना व्यापार

हार खेल की सम लगे रण में है धिक्कार
उत्सव में आनन्दमय  प्रेमी को स्वीकार

Sunday, June 30, 2024

।नही हैं दिखते बनाने वालेहरेक जगह हैं गिराने वालेजिन्हें बचाने तड़प रहे थेवही तो निकले फँसाने वाले2मुकर रहे हैं वे रोशनी से है उनकी किस्मत में तीरगी हीबर्क उन्हीं पर करी मुकर्ररजो आशियाँ थे दिलाने वाले3नहीं है ये कोई खुदा के बंदेये आँख वाले अक्ल के अंधेउन्ही के पाँवो जमीन खींचेंजो दे रहे हैं उन्हें निवाले4नापाक बंदे ये नाखुदा के खुद कश्तियो को डुबा रहे हैं क्या लिख सकेंगे ये खुशमिजाजीमोहब्बतों को मिटाने वालेorनापाक बंदे ये नाखुदा के जो भंवर में कश्ती फंसा रहे है क्या लिख सकेंगे ये खुशमिजाजीमोहब्बतों को मिटाने वाले5यकीं तरक्की औ उल्फतें भीनहीं तो आखिर क्या चाहते होन सरजमीं को दोजख बनाओनफरतों के न कर हवाले

नही हैं दिखते बनाने वाले
हरेक जगह हैं गिराने वाले
जिन्हें बचाने तड़प रहे थे
वही तो निकले फँसाने वाले
2
मुकर रहे हैं वे रोशनी से 
है उनकी किस्मत में तीरगी ही
बर्क उन्हीं पर करी मुकर्रर
जो आशियाँ थे दिलाने वाले
3
नहीं है ये कोई खुदा के बंदे
ये आँख वाले अक्ल के अंधे
उन्ही के पाँवो जमीन खींचें
जो दे रहे हैं उन्हें निवाले
4
नापाक बंदे ये नाखुदा के 
खुद कश्तियो को डुबा रहे हैं 
क्या लिख सकेंगे ये खुशमिजाजी
मोहब्बतों को मिटाने वाले

or
नापाक बंदे ये नाखुदा के 
जो भंवर में कश्ती फंसा रहे है 
क्या लिख सकेंगे ये खुशमिजाजी
मोहब्बतों को मिटाने वाले
5
यकीं तरक्की  औ उल्फतें भी
नहीं तो आखिर क्या चाहते हो
न सरजमीं को दोजख बनाओ
नफरतों के न कर  हवाले

यकीं तरक्की  औ उल्फतें भी
नहीं तो आखिर क्या चाहते हो
न सरजमीं को करो यूं दोजख 
न नफरतों के रहो हवाले

मैं बनाता रह गया श्रेष्ठता का काफियाऔ प्रतिष्ठा ले गया लूट कर एक माफियाअनसुनी करते रहे वो हर गुहारो प्रार्थनाएक्शन जब हो गया तब कहा ये क्या कियाइस तरह से मत खुलो कि संतुलन खोना पडेभांप कर मज्मूने खत हंस पडा था डाकियाकष्ट किश्तों में भला या फ़िर गुलामी चाहिएभींच ले तू मुठ्ठियाँ बदले हर इक जुगराफ़ियातख्ता पलट होने में कितनी देर लगती है कहोकेन्द्र तब तक ही सुरक्छित अहम जब तक हांशियाउद्विग्नता बढ़ती गयी ज्यों ज्यों निकट मंजिल हुईकर दवा कुछ होश की ला पिला दे साक़िया

मैं बनाता रह गया श्रेष्ठता का काफिया
औ प्रतिष्ठा ले गया लूट कर एक माफिया

अनसुनी करते रहे वो हर गुहारो प्रार्थना
एक्शन जब हो गया तब कहा ये क्या किया

इस तरह से मत खुलो कि संतुलन खोना पडे
भांप कर मज्मूने खत हंस पडा था डाकिया

कष्ट किश्तों में भला या फ़िर गुलामी चाहिए
भींच ले तू मुठ्ठियाँ बदले हर इक जुगराफ़िया

तख्ता पलट होने में कितनी देर लगती है कहो
केन्द्र तब तक ही सुरक्छित अहम जब तक हांशिया

उद्विग्नता बढ़ती गयी ज्यों ज्यों निकट मंजिल हुई
कर दवा कुछ होश की ला पिला दे साक़िया

Saturday, December 23, 2023

कॉटे कितने भी हो पांव न घायल करना है तोहटा मिटा या बीन बान करमार्ग बनाना ही होगाकींचड़ कितना भी हो श्वांस स्वच्छ लेना है तोजीवन निर्मल रख़ना है तोसाफ इसे करना ही होगाप्रतियोगी तो सदा रहे हैसदा रहेगी स्पर्धा भले युद्ध तक यह पंहुचे इसे जीतना ही होगा संकल्पों तक है कठिनाईउसके आगे जय ही जय हैदीर्घ काल तक रहे काल-स्वइसे बचा रखना होगा


कॉटे कितने भी हो 
पांव न घायल करना है तो
हटा मिटा या बीन बान कर
मार्ग बनाना ही होगा

कींचड़ कितना भी हो 
श्वांस स्वच्छ लेना है तो
जीवन निर्मल रख़ना है तो
साफ इसे करना ही होगा

प्रतियोगी तो सदा रहे है
सदा रहेगी स्पर्धा 
भले युद्ध तक यह पंहुचे 
इसे जीतना ही होगा 

संकल्पों तक है कठिनाई
उसके आगे जय ही जय है
दीर्घ काल तक रहे काल-स्व
इसे बचा रखना होगा

Monday, August 28, 2023

यहां हर एक अंधा है कोई भक्ति में कोई विरोध में यहां हर एक गुलाम है कोई प्रमाद का कोई विषाद कायहां हर एक विवादी हैकोई वादी है कोई प्रतिवादी हैपर संतुलित नहीं है कोईसमाधान का हिस्सा नहीं होना चाहता कोईक्यों कि सबको पता है वो स्वयं ही अपने स्थान पर अपनों के लिए समस्या हैजिस दिन आप होने लगेंगें समाधान का हिस्साआपके आसपास सौंदर्यमय जीवन जन्मने बढ़ने लगेगा शेष दुनिया के नर्क में भी आपकी प्रेरणा जाती रहेगी

यहां हर एक अंधा है 
कोई भक्ति में कोई विरोध में 
यहां हर एक गुलाम है 
कोई प्रमाद का कोई विषाद का
यहां हर एक विवादी है
कोई वादी है कोई प्रतिवादी है
पर संतुलित नहीं है कोई
समाधान का हिस्सा नहीं होना चाहता कोई
क्यों कि सबको पता है 
वो स्वयं ही अपने स्थान पर अपनों के लिए समस्या है
जिस दिन आप होने लगेंगें समाधान का हिस्सा
आपके आसपास सौंदर्यमय जीवन जन्मने बढ़ने लगेगा 
शेष दुनिया के नर्क में भी आपकी प्रेरणा जाती रहेगी

28 august 2022 फेसबुक पर पोस्ट

Tuesday, August 22, 2023

लालकिला / मणिपुर/ सियासत

लालकिला / मणिपुर/ सियासत

मेले हैं झमेले हैं अकेले हैं यहां इस दुनियादारी में
बहुत कुछ, रखना पड़ता है, यहां पर पर्दादारी में

तौल-ले-बोल तभी मुंह खोल इल्मदां आए हैं  कहते
सियासत कब जला दे क्या ? तेरी, ईमानदारी में 

वो आए घर,बराएशौक,किया सिजदा,दिया सदका 
तोहमतें,, नाम कर दी, फिर ,मेरी तीमारदारी में

सांप की बस्तियों में ,खोल ,दरखिड़कियां रखिए
इरादा जो भी हो ,शक है ,सलह में ,समझदारी में

तोडेगा न छोड़ेगा  , रहे कोई , दोस्त  या  दुश्मन 
सियासत दुश्मनों से ,और मुहब्बत फूल  यारी में 

ग़रदू
22अगस्त 23 को फेसबुक पर प्रकाशित

प्रिय अभिषेक प्रिय के लिए

अहो विकट
प्रिय मधु मादक 
हास्य चेतना एक साथ
अद्भुत विवेक का यह विलास
सुर ताल गति नव नवल छंद
सुरभित मकरित मृदु हास छंद
गाता शिक्षा का कुरुज्ञान 
ऐसी पींगें ऐसी उड़ान
छोटा न हो जाए वितान
समकालिक समर्थ रचना महान
कवि का कुल का हो यशोगान
धन्य धन्य अभिषेक तान

महामना के उद्गार
फेसबुक पर 22/अगस्त2021 को प्रकाशित

Friday, July 21, 2023

जीवन नहीं रुका करते है कुछ जीवन रूक जाने सेगरलपान कर अमिय बॉटने का संकल्प और दृढ़ होयद्यपि वह वीभत्स देखकर सिहर गया मन सहमा हैउधर गिरे इक माँ के आँसू इधर कई आँचल भीगेपांचाली का अपराधी, क्या केवल दुर्योधन था यामोह मदांध शकुनि के पांसो में फंसे युधिष्ठिर भीमूल्यों का संस्थापन करने अब समाज मन सुदृढ़ हो अच्छा है तुम्हें ग्लानि जगी , क्यों कि तुम संस्कारी होठगी गई बालाओं पर भी कभी पसीजा क्या मन यहसभ्यताओं पर क्रोध करो जिनका जीवन व्यभिचारी हैदिशाबोध दे करो नियंत्रण आपराधिक यह लाचारी हैसंकल्प करो दंडित करने का शौर्य हमारा सुदृढ़ होबहिष्कार है कायरता कुछ वीरोचित आभियान करोकृष्ण राम की तरह क्रूर अन्यायी पर संधान करो कुछ अर्जुन तैयार करो कुछ भीम भूमि पर खड़े करोमन विस्तार करो स्व का ,मत स्वांतसुखाय सिकुड़ रहोस्वयंप्रभा से करो समुज्ज्वल जगती का सम्बल सुदृढ़ होमम

जीवन नहीं रुका करते है कुछ जीवन रूक जाने से
गरलपान कर अमिय बॉटने का संकल्प और दृढ़ हो

यद्यपि वह वीभत्स देखकर सिहर गया मन सहमा है
उधर गिरे इक माँ के आँसू  इधर कई आँचल भीगे
पांचाली का अपराधी, क्या केवल दुर्योधन था या
मोह मदांध शकुनि के पांसो में फंसे युधिष्ठिर भी
मूल्यों का संस्थापन करने अब समाज मन सुदृढ़ हो 

अच्छा है तुम्हें ग्लानि जगी , क्यों कि तुम संस्कारी हो
ठगी गई बालाओं पर भी कभी पसीजा क्या मन यह
सभ्यताओं पर क्रोध करो जिनका जीवन व्यभिचारी है
दिशाबोध दे करो नियंत्रण आपराधिक यह लाचारी है
संकल्प करो दंडित करने का  शौर्य हमारा सुदृढ़ हो

बहिष्कार है कायरता कुछ वीरोचित आभियान करो
कृष्ण राम की तरह क्रूर अन्यायी पर संधान करो 
कुछ अर्जुन तैयार करो कुछ भीम भूमि पर खड़े करो
मन विस्तार करो स्व का ,मत स्वांतसुखाय सिकुड़ रहो
स्वयंप्रभा से करो समुज्ज्वल जगती का सम्बल सुदृढ़ हो

मम

दुनिया की सेहत को अच्छे रंग बिरंगे लोगलेकिन नहीं चाहिए भैया रंग बदलते लोग

दुनिया की सेहत को अच्छे रंग बिरंगे लोग
लेकिन नहीं चाहिए भैया रंग बदलते लोग

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