Sunday, July 5, 2015

 अनमना है गगन और धरा मौन है
किंचित है विचलित मन समीर का
तमतमा गया मुख सूर्य का
खुल गया है कोई स्कंध पीर का

कोसती है कोख अपने पाप का प्रसव
संवेदनाएं सोईं क्यों , कलुष गया जग
देखते रहे सब    अपराध वह जघन्य
क्यों शौर्यहीन हतबल हो मौन हुए अन्य
विदीर्ण हुआ आज पुनः ह्रदय चीर का
       
खुल गया है कोई स्कंध पीर का

 भीरुओं की भीड़ हुआ संगठन समाज
क्यों शेरों के वंश पे है सियारों का राज
करुणा न जगा पाई नानक की माटी
रहगई अशक्य क्यों गुरुतेग की परिपाटी
टूटा न तटबंध        क्यों धैर्य धीर का

खुल गया है कोई स्कंध पीर का

महामना
जगदीश गुप्त 

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