Monday, July 6, 2015

लघुकथा

वक्तव्य

जगदीश गुप्त

भूख पर सेमिनार चल रहा था | पहले दिन बड़े गंभीर भाषण हुए | एक वक्ता ने सुझाव दिया कि हम किसी भूखे का वक्तव्य भी सुनें | मुझे दायित्व मिला कि मैं किसी भूखे के ढ़ूढ कर लाऊं |
एक  होटल के आगे एक व्यक्ति मिला | जो भूखा लग रहा था लेकिन किसी से कुछ मांग भी नहीं रहा था| मैने स्वयं बढ़ कर उससे पूछा तो उसने बताया कि वह तीन दिन से निराहार है | मैे उसे भोजन कराने का आश्वासन देकर साथ ले आया | अभी भोजन में  समय था | वक्तव्य चल रहे थे | उद्घोषक ने घोषणा की कि अब तीन दिन से भूखा यह व्यक्ति भूख पर अपना वक्तव्य देगा | उसने उस व्यक्ति से कहा आप भूख पर अपने विचार विस्तार से रखें | इसके बाद आपको भोजन कराया जाएगा|
मैं भूखे वक्ता को मंच पर ले गया | वह ,इधर उधर देखने लगा | उसे बोलते न देख सभागार में उपस्थित जनों ने उसे हौसला देने के लिए बोलिए बोलिए मत घबराइए कहना आरंभ किया | मैं उसे हौसला  देने के लिए उसके पास गया उसके कंधे को आत्मीयता से थपकाया | आत्मीयता पा कर उसमें हलचल हुई | उसका हाथ पेट पर गया और वह अचानक हिलक कर रोने लगा |  उसका रुदन वक्तव्य सुन कर हर कोई भूख की वेदना को स्वयं में प्रविष्ट होते अनुभव कर रहा था हर कोई अवाक् था
|[12:34AM, 06/04/2015] jgdis Gupt:



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