
पुण्यघट रीते
देवता के द्वार से लौटे कलश रीते
पात्र का मंजन निरंतर ,
भावना से हृदय अंतर
सुद्ध सात्विकता के पुजारी ,
हो गए इतिहास बीते
कल क्रम से हारती हर जीत ,
आरती के उत्स का संगीत
साधना सातत्य का पर्याय ,
अवरोध और व्यतिक्रम पलीते
है समय की आत्मजा नियति ,
उम्र चढ़ते ही विदा 'सुमति'
भंवर भवरों को नहीं भांवर,
मधु विरत रसवंत सोम ही पीते